जकार्ता,  14 जुलाई को सुलावेसी में आए जबरदस्त तूफान में अल्दी की नाव की डोर तट पर लगे बांध से टूट गई। देखते-देखते यह तेज हवाओं के साथ बहकर हजारों मील दूर गुआम जलक्षेत्र में पहुंच गई। ‘जकार्ता पोस्ट’ के मुताबिक अल्दी की नाव एक ‘रोमपोंग’ थी, जिसमें न तो पेडल थे, न ही इंजन, जिससे वह खुद तट पर पहुंच सकें। ऐसे में उनके पास किसी जहाज के करीब से गुजरने का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बीच समुद्र में वह न सिर्फ डर, अकेलेपन के एहसास, बल्कि खाने-पीने के संकट से भी जूझने को मजबूर थे। एक हफ्ते में जनरेटर  का डीजल भी सूख गया था। 

वो 49 दिन...

- ठंड से बचने को नाव की लकड़ी काट-काटकर जलाई

- जाल में फंसने वाली मछली को आग में भूनकर खाते थे

- समुद्र का खारा पानी  टीशर्ट से छानकर पीते थे, ताकि शरीर में नमक की अधिकता न हो

मुझे लगता था कि मैं कभी अपने परिवार के पास नहीं लौट पाऊंगा। एक बार तो मन में खुदकुशी का ख्याल भी आया। मैंने पानी में डूबकर मरने की ठान भी ली थी, पर तभी मुझे मां की सीख याद आई। वह अक्सर कहती थी कि ईश्वर को याद करने और हौसला बनाए रखने से हर बाधा दूर हो जाती है। मैं बाइबिल की प्रति हाथ में लिए यही दुआ करता कि किसी जहाज की नजर मुझ पर पड़ जाए।  -अल्दी नोवेल अदिलांग

पनामाई जहाज बना मसीहा

31 अगस्त को गुआम तट से गुजर रहा पनामाई जहाज ‘अरपेगियो’ आल्दी के लिए मसीहा बनकर पहुंचा

10 जहाज ‘अरपेगियो’ से पहले वहां से निकले थे, पर किसी की भी नजर आल्दी की नाव पर नहीं पड़ी

सूझबूझ रंग लाई

- हवा में हाथ हिलाने और टी-शर्ट लहराने के बावजूद ‘अरपेगियो’ पर सवार नौसैनिकों की नजर अल्दी पर नहीं पड़ी

- इसके बाद अल्दी ने अपने रेडियो को उस फ्रीक्वेंसी पर डाला, जिसकी जानकारी एक नौसैनिक दोस्त ने उन्हें दी थी

- नाव से जारी सिग्नल जल्द ही ‘अरपेगियो’ के कैप्टन तक पहुंच गए, उन्होंने जहाज पीछे मोड़ा तो अल्दी दिखाई दिए

- हालांकि समुद्र की लहरें काफी तेज थीं, इसलिए अल्दी को बचाने के लिए ‘अरपेगियो’ को उनकी नाव तक ले जाना असंभव था

- 4 बार नाव के चक्कर लगाने के बाद कैप्टन ने एक मोटी रस्सी अल्दी के पास फेंकी, इसके सहारे अल्दी तैरते हुए जहाज पर पहुंचे

- 6 सितंबर तक जहाज पर खाने-पानी व अन्य पोषक तत्वों की जरूरी खुराक दी गई, 8 सितंबर को टोक्यो से जकार्ता की उड़ान भरी