हमारे देश में दशहरा का त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इस पर्व को विजय दशमी भी कहा जाता है। शारदीय नवरात्रि के समय नौ दिन मां दुर्गा का पूजन करने के बाद दसवें दिन रावण का पुतला बनाकर उसका दहन किया जाता है। इसका कारण और कथा त्रेतायुग से जुड़े हैं। त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। ये आदर्शवाद की प्रतिमूर्ति थे।

भगवान राम को अपने पिता के दिए हुए एक वचन के कारण 14 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा था। जब राम वन के लिए जाने लगे तो उनके छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी उनके साथ गए। वन में श्रीराम को देखकर लंका के राजा रावण की बहन सूर्पनखा श्रीराम पर मोहित हो गई और उसने श्रीराम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।

श्रीराम ने सूर्पनखा को आदरपूर्वक बताया कि वह उनसे विवाह नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी सीता को वचन दिया है कि वह उनके अतिरिक्त किसी और से विवाह नहीं करेंगे। यह कहकर श्रीराम ने सूर्पनखा को लक्ष्मण के पास भेज दिया। लक्ष्मण के पास जाकर सूर्पनखा विवाह करने की हठ करने लगीं तो लक्ष्मण ने उन्हें मना कर दिया। इस पर सूर्पनखा नहीं मानी तो लक्ष्मण ने क्रोधित होकर उसके नाक-कान काट दिए।

रोती हुई सूर्पनखा अपने भाई रावण के पास पहुंची और उसे राम और लक्ष्मण के बारे में बताया। तब रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया। फिर राम भक्त हनुमान ने माता सीता की खोज की। बहुत समझाने के बाद भी जब रावण माता सीता को ससम्मान श्रीराम के पास भेजने के लिए तैयार नहीं हुआ तो श्रीराम ने उसका वध कर दिया और माता सीता को लंका से वापस ले आए।

श्रीराम ने जिस दिन रावण का वध किया उस दिन शारदीय नवरात्र की दशमी तिथि थी। इसीलिए इस त्योहार को विजयदशमी भी कहते हैं। रावण के बुरे कर्म पर श्रीराम की अच्छाई की जीत हुई इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के त्योहार के रूप में भी मनाते हैं। विजयदशमी पर रावण का पुतला बनाकर उसका दहन किया जाता है। रावण के साथ ही उसके बेटे मेघनाथ और भाई कुंभकरण के पुतले का भी दहन किया जाता है।