शरद पूर्णिमा को पर्व के रुप में मनाया जरुर जाता है, लेकिन इस दिन यदि पूरे विधि-विधान से देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना के साथ व्रत रखा जाए तो न सिर्फ लंबी आयु मिलती है बल्कि परिवार धनधान्य भी होता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इस पूर्णिमा पर श्रद्धालु महालक्ष्मी की आराधना कर व्रत रखते हैं। इस बार शरद पूर्णिमा एवं व्रत 24 अक्टूबर, बुधवार को है। चूंकि शरद पूर्णिमा अन्य सभी पूर्णिमा से अधिक महत्व रखती है अत: इसे पर्व के रुप में मनाने का अपना ही महत्व हो जाता है। शरद पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। इस दिन धन प्राप्ति व रोग मुक्ति के लिए किए गए उपाय भी कारगार साबित होते हैं। इस प्रकार विशेष प्रयोग करते हुए सेहत के साथ अपार प्रेम और धन प्राप्त किया जा सकता है।
शरद पूर्णिमा के संबंध में पौराणिक कथा है कि इस दिन माता लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए धन प्राप्ति के लिए यह तिथि सबसे उत्तम है। इसलिए लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना धन प्राप्ति के लिए विशेष रुप से की जाती है। विधि-विधान से पूजा व व्रत करने के लिए जरुरी है कि शरद पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी ब्रह्ममुहूर्त में उठें और समस्त दैनिक कार्यों से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। ऐसा करने के बाद अपने आराध्य देव को स्नान कराकर उन्हें आसन धारण कराने के लिए प्रार्थना करें और उसके बाद उनका पूजन करें। इसके बाद गाय के दूध से बनी खीर में घी तथा शकर घोल लें, मीठी पूरियों की रसोई तैयार करें और उसके बाद अर्द्धरात्रि के समय भगवान को भोग लगाएं। जब भगवान को भोग लग जाए तो एक लोटे में जल तथा गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने में रोली व चावल रखकर कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाएं। कलश स्थापना होने के बाद गेहूं के 13 दाने हाथ में और उसके बाद ही व्रत कथा सुनें। कथा पूर्ण होने के बाद गेहूं के गिलास पर हाथ फेरें और मिश्राणी के पांव छूकर गेहूं के गिलास को उन्हें दे दें। अंत में लोटे के जल से रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य दें। जो प्रसाद है उसे लोगों में बांट दें। मान्यताअनुसार इस रात्रि चांद की रोशनी में सुई में धागा अवश्य पिरोएं। सेहत और रोग के निराकरण हेतु पूर्ण चंद्रमा जब आकाश के मध्य आ जाए तो उसका पूजन करें। खीर से भरी थाली खुली चांदनी में रखें और दूसरे दिन सबको उसका प्रसाद वितरित करें। इस प्रसाद को स्वयं भी ग्रहण करें।
यहां आपको बतलाते चलें कि शरद पूर्णिमा को 'कोजागर पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। मान्‍यतानुसार इस दिन धन की देवी लक्ष्‍मी रात को विचरण करते हुए कहती हैं, 'को जाग्रति'। अर्थात 'कौन जगा हुआ है?' कहा जाता है कि जो भी व्‍यक्ति शरद पूर्णिमा के दिन रात में जागता है मां लक्ष्‍मी उन्‍हें उपहार प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा को श्रीकृष्ण की जादुई बांसुरी वादन से भी जोड़कर देखा जाता है। दरअसल श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन भगवान कृष्‍ण ने जब बांसुरी बजाई तो उसकी जादुई ध्वनि से सम्‍मोहित हो वृंदावन की समस्त गोपियां उनकी ओर खिंची चली आईं थीं। मान्यता है कि इस रात ही श्रीकृष्ण ने प्रत्येक गोपी के लिए एक कृष्‍ण बनाया था। यह वही रात है जिसमें कृष्‍ण गोपियों के साथ नाचते रहे, जिसे 'महारास' के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार इस शरद पूर्णिमा का अपना ही अलग महत्व है, जिससे सभी श्रद्धालु इसे पर्व के रुप में मनाते हैं।