हाल ही में इलाहबाद और फैज़ाबाद का नाम बदलने को लेकर खूब राजनीतिक बहस हुई. विरोधियों ने इसे बीजेपी की हिंदू वोट बैंक को साधने की कोशिश बताया. राजस्थान चुनाव में हमने इस बात की पड़ताल की, कि क्या वाकई जगह का नाम बदलने के नाम पर लोग वोट देते हैं?

राजस्थान सरकार ने पिछले एक साल में 8 गावों के नाम बदले हैं. ये सभी मुस्लिम नाम थे जिनको बदल कर हिंदू नाम रखे गए... मसलन मियां का बाड़ा अब महेश नगर हो गया है, सलेमाबाद अब श्री निम्बार्क तीर्थ हो गया है और ईस्माइलपुर का नाम हो गया है कौशल नगर. जानकार इसे वोट बैंक पॉलिटिक्स बताते हैं लेकिन क्या इससे वोटों पर वाकई फर्क पड़ रहा है. हम ये जानने के लिए श्री निम्बार्क तीर्थ उर्फ सलेमाबाद पहुंचे ताकि नाम बदलने की राजनीति और इतिहास को समझ सकें.

निम्बार्क पीठ का 550 साल पुराना इतिहास है और नाम बदलने की स्थानीय लोगों की ये मांग भी दशकों पुरानी है. लोग मांग माने जाने से खुश तो हैं लेकिन इसे वोट की राजनीति से बिलकुल अलग बताते हैं. कोई गांव वाला ये नहीं कहता कि सलेमाबाद अब निम्बार्क तीर्थ हो गया है इसलिए वो बीजेपी या वसुंधरा सरकार के पक्ष में वोट देंगे. इन गांव वालों के लिए ये पहले भी निम्बार्क तीर्थ ही था और आज भी.

लोगों से बात करते हुए हमें लगा कि सलेमाबाद के इतिहास को भी समझना चाहिए. हमारी जिज्ञासा हमें श्री निम्बार्क पीठ तक ले गई.
सलेमाबाद नाम कैसे पड़ा

शेर शाह सूरी की औलाद नहीं थी. निम्बार्क आचार्य से आशीर्वाद के बाद पुत्र प्राप्ति हुई. इसलिए बादशाह ने अपने बेटे सलीम के नाम पर गांव का नाम सलेमाबाद रख दिया.
निम्बार्क संग्रहालय

सरकार इस क्षेत्र में निम्बार्क पीठ का प्रभाव अच्छे से समझती है इसलिए नाम बदलने के साथ ही चुनाव से पहले निम्बार्क तीर्थ पर एक संग्रहालय भी तैयार कर दिया गया है.लोगों का कहना है कि निम्बार्क पीठ के 500 साल के इतिहास को देखते हुए और गांव में मुस्लिम परिवार न होने के चलते लोगों ने नाम बदलने की मांग की थी जिसे सरकार ने मान तो लिया लेकिन सिर्फ कागजों पर. लोगों का कहना है कि अखबारों में पढा की नाम बदल दिया गया है.