अहमदाबादः देशभर से संस्कृत भाषा को जब लोग धीरे धीरे भूलते जा रहे है, वहीं देश में एक ऐसा विद्यालय भी है जहां बच्चों को पहली कक्षा से ही संस्कृत भाषा का ज्ञान दिया जाता है. पिछले 20 साल से अहमदाबाद के नारोल में स्थित श्री अग्रसेन विद्या मंदिर में पढ़ने वाले बच्चे किसी एक ही जाति या कौम से ना होकर विभिन्न जातियों और धर्म से आते है.
यहां जिस वक्त संस्कृत का अभ्यास कराया जाता है उस वक्त एक अनोखा दृश्य सामने आता है. यहां मुस्लिम बच्चो में भी संस्कृत को लेकर दिलचस्पी देखी जा सकती है. इस विद्यालय में पहली से लेकर आठवी में पढ़ने वाला हर बच्चा ऐसा है, जो मुंह जुबानी गीता का पाठ ना सिर्फ बोलता है बल्कि उसका मतलब भी समझाता है. विद्यालय में सिखाए जाने वाला अष्टादश श्लोकी गीता का पाठ हो या फिर जन्माष्टमी में की जानी वाली गौ पूजा. यहां अभ्यास करने वाले मुस्लिम समुदाय के बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी बढ़ चढ़ कर कार्यक्रम में हिस्सा लेते है.
अहमदाबाद के नारोल में स्थित
श्रीअग्रसेन विद्या मंदिर ‘विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान’ नामक संस्था के साथ संलग्न भी है. जिसकी वजह से गुजरात बोर्ड के विषयों के अलावा विविध 5 विषय अलग से बच्चों को पढाए भी जाते है, जिसमें संस्कृत, योगा, नैतिक शिक्षण, संगीत और शारीरिक शिक्षण का समावेश होता है. इस विद्यालय में डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर का फोटो भी मुख्य हॉल में देखा जा सकता है. 

विद्यालय के क्लास में बच्चों को बैठने के लिए यहां छोटा टेबल दिया गया है तो साथ में जमीन पर एक आसन भी बिछा हुआ होता है. जिसपे बच्चे साथ बैठकर अभ्यास करते है. फिर चाहे वो किसी भी समुदाय का क्यों ना हो…. पहली से आठवी कक्षा तक विद्यालय में करीब 350 जितने बच्चे अभ्यास करते है, इनमे से 130 यानी 37% बच्चे ऐसे है जो की मुस्लिम समुदाय से आते है बाकी के यानी 220 बच्चे विविध समुदाय ख़ासकर हिन्दू समुदाय से आते है.
श्री अग्रसेन विद्या मंदिर की स्थापना 20 साल पहले की गई थी… विद्यालय के ट्रस्टी रमेश अग्रवाल कहते है की स्कूल की स्थापना से लेकर अब तक कई बार फंड को लेकर दिक्कते आई पर कई दाताओं की मदद से आज भी विद्यालय बच्चो के अच्छे भविष्य के लिए वो कार्यरत है… कई दाता ऐसे भी है जो विद्यालय के बच्चो कीस्कूल फ़ीस भी जमा करते है तो साथ में किताबें और स्वेटर तक दे जाते है.

विद्यालय में संस्कृत पढाए जाने के बारे में ट्रस्टी रमेश अग्रवाल कहते है की यहाँ किसी भी बच्चे के साथ भेदभाव नहीं रखा जाता, हर एक बच्चा चाहे वो किसी भी समुदाय का हो वो अपने मर्जी से ही संस्कृत के पाठ सीखता है, जिसका कभी भी किसी मुस्लिम बच्चों के माता-पिता ने विरोध नहीं किया.