मेरा कुछ भी नहीं है और मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि इतनी सी बात जीवन में आ जाए तो शांति और प्रसन्नता स्वाभाविक हो जाएगी। इंसान को अपने कल्याण के लिए सत्य के मार्ग पर चलते हुए असत्य का त्याग करना है। सुख-दुख साधन सामग्री है, जीवन नहीं। सुख भोग की वासना से ऊपर उठने पर ही दुखों की निवृत्ति होती है।
सुख और दुख विधान से आते हैं, इसलिए इनका सदुपयोग करो। सुख का सदुपयोग है- मिली हुई सामर्थ्य से समाज की सेवा। दुख का सदुपयोग है- ममता, कामना और आसक्ति का त्याग। आज मनुष्य प्रचुर संपन्नता के बीच रहते हुए जितना संतृप्त है, उतना कभी नहीं रहा। सही मायने में देखा जाए तो समस्त कठिनाइयों और परेशानियों की जड़ मनुष्य की मानसिक स्थिति है। महापुरुषों ने अपने अनुभवों के आधार पर समुचित जीवन जीने के लिए कुछ मापदंड और कुछ जीवन मूल्य निर्धारित किए। उन्हें अपनाया जाए तो मनुष्य अपने मन पर विजय पा सकता है।
अपने मन पर विजय पा लेने का अर्थ है- दुनिया जीत लेना। शास्त्रों ने जीवन जीने के लिए जितने भी आचरण तथा मूल्य निर्धारित किए हैं, उनका मूल आधार नैतिकता है। उसके तीन मूल सिद्धांत- ब्रह्मचर्य, अहिंसा और सत्य हैं। इन तीनों मूल सिद्धांतों का संबंध हमारे व्यक्तित्व के शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक स्तर से है।

पहले ब्रह्मचर्य का अर्थ है- अपने समस्त इंद्रिय भोगों पर नियंत्रण। इसका प्रयोजन इंद्रिय दमन कदापि नहीं है। विषयों का संसार हमारे लिए है। उनके उपभोग की स्वतंत्रता पर शास्त्र पूरी तरह रोक नहीं लगाते, किंतु यह निर्देश अवश्य देते हैं कि हम अपने को शरीर का स्वामी समझें और इंद्रिय भोगों के दास न बन जाएं। दूसरा है- अहिंसा। इसके पालन में कभी-कभी बाहरी तौर पर क्रूर बनना आवश्यक हो जाता है। किंतु कथित क्रूरता के पीछे हमारे हृदय में दया, सौहार्द्र और प्रेम भरा होना चाहिए।
तीसरा है- सत्य। यह एक ऐसा जीवन मूल्य है जिसमें अपनी बौद्धिक मान्यताओं के प्रति ईमानदार बने रहने की आवश्यकता होती है। मनुष्य का गौरव इस बात में है कि वह अपने मानवीय जीवन मूल्यों के अनुसार जिए। हमारे यहां सत्य को परमात्मा कहा गया है, परंतु हम लोग बिल्कुल उल्टा करते हैं। अपने को प्रभु प्राप्ति के योग्य न मानना और परमात्मा को अपने से दूर मान लेना-यह साधकों के लिए उचित नहीं है।

महापुरुषों द्वारा सुझाए गए रास्ते पर चलकर आप उस अनंत की सत्ता स्वीकार कर लें- यही सत्संग है। फिर आपकी उपासना चाहे साकार हो या निराकार, आपकी सभी कठिनाइयां दूर हो जाएंगी। ऐसी उपासना कभी खंडित नहीं होती। जिस साधक का अपने शरीर से तादात्म्य टूट जाएगा, वह अशरीरी आनंद में निमग्न हो जाएगा। उस दिन से उसके शरीर की रक्षा और आवश्यकताओं का दायित्व उस पर नहीं रहेगा।

अशरीरी आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि असीम आनंद को सीमित उपादानों से भाषाबद्ध किया जाना असंभव है। विचारशील साधकों में शरीर की असंगता और स्वाधीनता का आनंद कभी खंडित नहीं होता। क्योंकि जीव सभी का है। इसलिए वह हमें भी मिल सकता है। कभी निराश मत हो। अगर साधना से जीवन में रस नहीं बढ़ रहा है और निश्चितता नहीं आ रही है तो व्यक्तिगत सत्संग करो।