अखाड़ों के बड़े-बड़े पंडाल से लेकर उनकी शान शौकत को देखकर सभी हैरान होते है कि अखाड़ों के पास इतना पैसा कहां से आता कि वह रथ, घोड़े, हाथी और चांदी की पालकी में सवारी कैसे करते हैं। अखाड़ों का अर्थशास्त्र मूल रूप से दान-पुण्य पर टिका है। अब सवाल यह भी है कि इतना दान कहां से आता है। इसका जवाव बेहद आसान है। अखाड़े के देशभर में कई मंदिर, विद्यालय के साथ कई गौशाला भी संचालित हैं। देश के अलावा विदेशों में अमेरिका ब्रिटेन और कनाडा में भी अखाड़े की संपत्ति व साधक हैं।
इससे होने वाली आय से अखाड़े जनकल्याण के कार्यक्रम संचालित करते हैं। अखाड़े के नाम पेनकार्ड भी है। देश-विदेश में फैले भक्तों से मिलने वाले दान-पुण्य से ही अखाड़ा संचालित होता है। अखाड़े की ओर से तमाम संस्कृत विद्यालय के साथ मंदिर संचालित हैं। देश-दुनिया में फैले दानदाताओं के दान से ही अखाड़ा संचालित होता है। अखाड़े का सोसायटी एक्ट के तहत अब रजिस्ट्रेशन भी है। इसी तरह कुंभनगरी में मौजूद अखाड़ों का संचालन देश-विदेश के दानदाताओं के पैसे से होता है।