गुंजन कहती हैं कि उनकी कोशिश यह है कि पहले तो हल्द्वानी और फिर नैनीताल में किसी भी बच्चे को भीख न मांगनी पड़ी.
हल्द्वानी में महिला दिवस पर बात एक ऐसी वीरांगना की जो अकेले ही कई बदकिस्मत बच्चों की किस्मत बदलने में जुटी हुई हैं. हल्द्वानी शहर और आस-पास के इलाक़े में कूड़ा उठाने और भीख मांगने का काम करने वाले बच्चों के चेहरे पर आज मुस्कान दिखती है, उनकी आंखों में बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखती है. और यह हुआ है समाजसेवी गुंजन बिष्ट अरोड़ा की वजह से जिन्होंने इन बच्चों का वर्तमान बेहतर करना और भविष्य सुधारना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है.  हल्द्वानी में महिला दिवस पर बात एक ऐसी वीरांगना की जो अकेले ही कई बदकिस्मत बच्चों की किस्मत बदलने में जुटी हुई हैं. हल्द्वानी शहर और आस-पास के इलाक़े में कूड़ा उठाने और भीख मांगने का काम करने वाले बच्चों के चेहरे पर आज मुस्कान दिखती है, उनकी आंखों में बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखती है. और यह हुआ है समाजसेवी गुंजन बिष्ट अरोड़ा की वजह से जिन्होंने इन बच्चों का वर्तमान बेहतर करना और भविष्य सुधारना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है.
हल्द्वानी में महिला दिवस पर बात एक ऐसी वीरांगना की जो अकेले ही कई बदकिस्मत बच्चों की किस्मत बदलने में जुटी हुई हैं. हल्द्वानी शहर और आस-पास के इलाक़े में कूड़ा उठाने और भीख मांगने का काम करने वाले बच्चों के चेहरे पर आज मुस्कान दिखती है, उनकी आंखों में बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखती है. और यह हुआ है समाजसेवी गुंजन बिष्ट अरोड़ा की वजह से जिन्होंने इन बच्चों का वर्तमान बेहतर करना और भविष्य सुधारना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है.

गुंजन बिष्ट अरोड़ा ने जब अपना समय और संसाधन गरीब बच्चों का जीवन सुधारने के लिए देने का फ़ैसला लिया तो उन्हें बहुत सारे विरोधों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने वीरांगना नाम की संस्था बनाई और इन बच्चों को पढ़ाने में जुट गईं.  गुंजन बिष्ट अरोड़ा ने जब अपना समय और संसाधन गरीब बच्चों का जीवन सुधारने के लिए देने का फ़ैसला लिया तो उन्हें बहुत सारे विरोधों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने वीरांगना नाम की संस्था बनाई और इन बच्चों को पढ़ाने में जुट गईं.
गुंजन बिष्ट अरोड़ा ने जब अपना समय और संसाधन गरीब बच्चों का जीवन सुधारने के लिए देने का फ़ैसला लिया तो उन्हें बहुत सारे विरोधों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने वीरांगना नाम की संस्था बनाई और इन बच्चों को पढ़ाने में जुट गईं.
भीख मांगने और कूड़ा उठाने वाले आज 150 से ज्यादा बच्चे आज वीरांगना के इस स्कूल में आते हैं. खास बात ये है कि यहां इन बच्चों को नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और कपड़ों तक की व्यवस्था की जाती है.  भीख मांगने और कूड़ा उठाने वाले आज 150 से ज्यादा बच्चे आज वीरांगना के इस स्कूल में आते हैं. खास बात ये है कि यहां इन बच्चों को नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और कपड़ों तक की व्यवस्था की जाती है.
भीख मांगने और कूड़ा उठाने वाले आज 150 से ज्यादा बच्चे आज वीरांगना के इस स्कूल में आते हैं. खास बात ये है कि यहां इन बच्चों को नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और कपड़ों तक की व्यवस्था की जाती है.

 लंबे संघर्ष के बाद अब स्कूल और गुंजन की कोशिशों को समाज की भी मान्यता मिलने लगी है. आम लोग भी अब गुंजन के प्रयास में मदद करने लगे हैं.  लंबे संघर्ष के बाद अब स्कूल और गुंजन की कोशिशों को समाज की भी मान्यता मिलने लगी है. आम लोग भी अब गुंजन के प्रयास में मदद करने लगे हैं.
लंबे संघर्ष के बाद अब स्कूल और गुंजन की कोशिशों को समाज की भी मान्यता मिलने लगी है. आम लोग भी अब गुंजन के प्रयास में मदद करने लगे हैं.

गुंजन कहती हैं कि उनकी कोशिश यह है कि पहले तो हल्द्वानी और फिर नैनीताल में किसी भी बच्चे को भीख न मांगनी पड़ी. बहुत रुचि लेकर पढ़ाई कर रहे इन बच्चों को देखकर लगता है कि उनकी कोशिश सफल हो रही है.  गुंजन कहती हैं कि उनकी कोशिश यह है कि पहले तो हल्द्वानी और फिर नैनीताल में किसी भी बच्चे को भीख न मांगनी पड़ी. बहुत रुचि लेकर पढ़ाई कर रहे इन बच्चों को देखकर लगता है कि उनकी कोशिश सफल हो रही है.
गुंजन कहती हैं कि उनकी कोशिश यह है कि पहले तो हल्द्वानी और फिर नैनीताल में किसी भी बच्चे को भीख न मांगनी पड़ी. बहुत रुचि लेकर पढ़ाई कर रहे इन बच्चों को देखकर लगता है कि उनकी कोशिश सफल हो रही है.