नई दिल्ली। नोटा एक ऐसा विकल्प के रुप में आया है जिसे गिना जरूर जाता है हांला‎कि यह चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं डालता है।  सिर्फ ट्रेंड पता चलता है कि आखिर कितने प्रतिशत मतदाता या वोटर किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करते हैं। यह विकल्प रद्द मत होता है। बता दें कि नोटा का मतलब है नन ऑफ द एबव, यानी इनमें से कोई नहीं। नोटा का यह विकल्प 2015 से पूरे देश मे लागू ‎किया गया था।  बता दें कि भारत, ग्रीस, यूक्रेन, स्पेन, कोलंबिया और रूस स‎हित कई देशों में नोटा का विकल्प आज लागू है।  
साल 2009 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा के विकल्प को उम्मीदवारों की सूची के साथ जोड़ने संबंधी अपनी बात रखी थी। बाद में नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ ने भी नोटा के समर्थन में एक जनहित याचिका दायर की।  इस पर 2013 में कोर्ट ने वोटर्स को नोटा का विकल्प देने का फैसला किया था।  हालांकि बाद में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि नोटा के मत गिने तो जाएंगे पर इसे रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाएगा।  इस तरह से यह साफ था कि इसका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। माना जाता है कि वोटर लिस्ट में नोटा का पहली बार 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में इस्ला विस्टा म्युनिसिपल एडवाइजरी काउंसिल के चुनाव में ‎किया गया था।  
नोटा विकल्प के आने से पहले, नकारात्मक वोट डालने वाले लोगों को एक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करना पड़ता था और एक अलग बैलट पेपर पर अपना वोट डालना पड़ता था।  चुनाव नियम, 1961 की धारा 49-O के तहत, एक मतदाता फॉर्म 17ए में वोटर अपना चुनावी क्रम संख्या लिखकर एक नकारात्मक वोट डालता था।  फिर पीठासीन अधिकारी उसे देखकर इस पर वोटर से हस्ताक्षरित करता था। हांला‎कि इस प्र‎‎क्रिया  से धोखाधड़ी या वोटों के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था। यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक माना गया क्योंकि इससे मतदाता की पहचान सुरक्षित नहीं थी। आज चुनाव के दौरान, ईवीएम में उम्मीदवारों की सूची के अंत में नोटा का भी विकल्प होता है। 
भारत निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में इनमें से कोई नहीं अर्थात नोटा(नन ऑफ द एवब) बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश देने के बाद इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार 2014 के आम चुनावों में 5 लोकसभा सीटों पर लोगों ने काफी ज्यादा नोटा का बटन दबाया था।  खास तौर पर तमिलनाडु की नीलगिरी लोकसभा सीट, ओडिशा की नबरंगपुर सीट, कोरापुट सीट, छ्त्तीसगढ़ की बस्तर सीट भी इसमें शामिल थीं।  सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सितंबर में चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के मतदाताओं के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह देश की राजनीतिक व्यवस्था को साफ करने में एक लंबा रास्ता तय करेगा।