लोकसभा चुनाव से पहले चौकीदार को लेकर सियासत तेज है. खुद को चौकीदार बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल डील में घपले का आरोप लगाकर चोर बताया तो बीजेपी ने भी इसे चुनावी मुद्दा बना दिया. सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में "मैं भी चौकीदार" कैंपेन को लांच किया गया. जिसके बाद बीजेपी के तमाम दिग्गज नेताओं ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगा लिया.

लेकिन चौकीदारों पर शुरू हुई सियासी शोर के बीच वह असली चौकीदार कहीं गुम हो गया है, जो कई सालों से रातों में जागकर समाज की सुरक्षा कर रहा है. बेहद कम पैसों में मजदूरों से भी बदतर जीवन जी रहे और इमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहे इन चौकीदारों की सुध किसी ने नहीं ली. देश और समाज की सुरक्षा की एक अहम कड़ी इन चौकीदारों की जमीनी हकीकत का जायजा लिया न्यूज18 ने.


जब हम सो रहे होते हैं तो आधी रात सीटी बजाते और जागते रहो की आवाज से हम सब वाकिफ हैं. लेकिन शायद उनकी जिंदगी की हकीकत से रू-ब-रू नहीं हैं. आपको जानकार ताज्जुब होगा जब पूरा गांव व शहर सो जाता है तो अपनी नींद को कुर्बान कर के अपने शरीर को अपनी जरूरतों के हिसाब से ढाल कर जाड़ा, गर्मी और बरसात के बीच हमारे शहर, गली और मोहल्लों की सुरक्षा करते हैं चौकीदार.
समाजवादियों के गढ़ इटावा में पिछले लगभग 20 सालों से चौकीदारी कर रहे रुकुम सिंह अभी तक अपने परिवार को गरीबी से नहीं उबर पाए हैं. दिहाड़ी मजदूरों से भी कम पैसे में यह चौकीदारी करते हैं और इनके जैसे तमाम चौकीदार 8 घंटे की वजह 12 घंटे की ड्यूटी करने के लिए मजबूर हैं. अंतहीन शोषण के लिए मजबूर हैं.
चौकीदार रुकुम सिंह 15-20 सालों से चौकीदारी कर रहे हैं. जब उनसे हमारी टीम ने पूछा कि प्रधानमंत्री खुद को चौकीदार बताते हैं तो कैसा लगता है. रुकुम सिंह कहते हैं, "अचछा लग रहा है कि कोई चौकीदार की भलाई के लिए सोच रहा है. उसके बारे में सोच रहा है." उधर राहुल गांधी के चौकीदार चोर है कहने पर रुकुम सिंह दुखी हो जाते हैं और कहते हैं हम अपना काम ईमानदारी से करते हैं. 12 घंटे की ड्यूटी भी करते हैं. इसलिए अगर कोई चोर कहता है तो गलत लगता है. रुकुम सिंह यह भी कहते हैं कि चौकीदार को लेकर सियासत नहीं होनी चाहिए. लेकिन अगर कोई चौकीदार को चोर कहता है तो अपमानित महसूस करते हैं.

रुकुम सिंह के दो बच्चे हैं और वे जितना कम पाते हैं उससे घर का खर्चा भी नहीं चल पाता. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और दवाई का खर्चा भी निकलना मुश्किल है. आज जो एक मजदूर कमाता है उससे भी कम एक चौकीदार को मिल रहा है. वे बताते हैं आज तक कोई भी राजनेता चौकीदारों के परिवारों के हालचाल जानने नहीं पहुंचा.

क्या है चौकीदारी का इतिहास?

दरअसल गांवों में चौकीदार की नियुक्ति का कम अंग्रेजों के समय शुरू हुआ. उस वक्त वे गांव की रखवाली के साथ ही पुलिस के मुखिबिर का भी काम करते थे. आजादी के बाद भी यह व्यवस्था बदस्तूर जारी रही. चौकीदार स्थानीय पुलिस की ख़ुफ़िया तंत्र का एक अहम हिस्सा है. किसी भी वारदात को सुलझाने और अपराधियों को पकड़वाने में आज भी चौकीदारों की मुख्य भूमिका होती है. समय के साथ चौकीदारी का काम गांवों से निकलकर शहर तक भी पहुंचा. आज शहरों में कई सिक्योरिटी एजेंसी गार्ड्स मुहिया करा रही हैं. जो आपके घर, दफ्तर, दुकान और मॉल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. लेकिन गांव के चौकीदारों की स्थिति आज भी नहीं सुधरी है.

सीएम योगी ने नया नाम दिया ग्राम प्रहरी, मानदेय बढ़ाया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने में ग्राम चौकीदारों का पदनाम बदलकर ग्राम प्रहरी कर दिया. उन्होंने कहा कि उनकी भूमिका सुरक्षा के दृष्टि से महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है. उन्होने कहॉ कि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले अपराध की सूचना पुलिस अफसरो तक पहुंचाने में ग्राम चौकीदार अहम् भूमिका निभा सकते है.

पिछले दिनों छह मार्च को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्राम चौकीदारों के मानदेय को 1000 रुपया प्रतिमाह कर दिया. अब उन्हें 2500 रुपए प्रतिमाह मंदी मिलेगा.