जबलपुर। आगामी लोकसभा चुनाव में नोटा यानी ‘नन ऑफ द अबव’ विलेन बन सकता है। दरसल कुछ दिनों पहले प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में नोटा ने भाजपा का खेल बिगाड़ दिया था। प्रदेश की ११ ऐसी सीटें थीं जहां जीत और हार के अंतर से अधिक वोट नोटा पर पड़े थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नोटा प्रयोग देश में तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में करीब ६० लाख लोगों ने पूरे देश में नोटा का प्रयोग किया था।
वर्ष २०१८ में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनावों में करीब ४.६६ लाख लोगों ने नोटा का बटन दबाया था। इनमें ११ ऐसी सीटें थीं जहां हार के अंतर से अधिक नोटा पर वोट मिले थे। यह संयोग ही है कि इन सभी सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी फायदे में रहे और उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी ही थे। इन ११ सीटों पर यह मान लिया जाए कि मतदाताओं की नाराजी अथवा प्रत्याशियों के प्रति निराशा न होती तो प्रदेश की सियासी तस्वीर कुछ और ही होती। इनमें से यदि आधी सीटों पर ही 'नोटा' का असर न पड़ता अथवा वह वोट भाजपा के खाते में चला जाता तो प्रदेश में कांग्रेस के बजाय चौथी बार फिर भाजपा की सरकार ही बन जाती।
पैâक्ट फाइल......
४.६६ लाख लोगों ने विस चुनाव मप्र में दिया था नोटा को वोट
६० लाख लोगों ने पिछले लोकसभा चुनाव में दबाया था नोटा
११ सीटों पर हार-जीत के अंतर से अधिक मिले थे नोटा को वोट

इन ११ सीटों पर नोटा ने बिगाड़ दिया भाजपा का खेल........
- ब्यावरा में कांग्रेस प्रत्याशी ८२६ वोट से जीता, जबकि नोटा में १४८१ मत गिरे। 
- दमोह में वित्तमंत्री जयंत मलैया ७९८ मतों से हारे और नोटा में १२९९ वोट निकले। - गुन्नाोर में जीत हार का अंतर १९८४ मतों का रहा, जबकि नोटा में ३७३४ वोट चले गए। - ग्वालियर दक्षिण का फैसला १२१ वोटों से हुआ, वहीं १५५० लोगों ने नोटा को दबाया।
- जबलपुर में राज्यमंत्री शरद जैन ५७८ मतों से हारे जबकि १२०९ वोट नोटा पर पड़े।
- जोबट में २०५६ मतों से फैसला हुआ, लेकिन नोटा में सबसे ज्यादा ५१३९ वोट चले गए। - मंधाता में जीत-हार का फैसला १२३६ वोट से हुआ लेकिन १५७५ लोगों ने नोटा को चुना।
- नेपानगर में भाजपा को जीतने के लिए ७३२ वोट चाहिए थे पर २५५१ वोट नोटा पर पड़े।
- राजनगर में विक्रम सिंह नातीराजा ७३२ वोट से जीते, वहीं २४८५ वोट नोटा में पड़े।
- राजपुर में भाजपा को जीत के लिए ९३२ वोट चाहिए थे, लेकिन ३३५८ वोट नोटा पर पड़े।
- सुवासरा में भाजपा को जीतने के लिए मात्र ३५० वोट चाहिए थे, लेकिन २९७६ वोट नोटा पर पड़े।
ये था लोकसभा २०१४ का गणित.......
वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में पहली बार नोटा यानी ‘नन ऑफ द अबव’ का इस्तेमाल किया गया था। पिछले चुनावों में ८३.४१ करोड़ में से ५५.३८ करोड़ (६६.४ प्रतिशत) मतदाताओं ने ५४३ सीटों पर वोट डाले थे। इनमें से करीब ६० लाख वोट नोटा यानी ‘इनमें से कोई नहीं’ को पड़े थे। पिछले आम चुनावों में जिन १० सीटों पर नोटा का वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा रहा, उनमें से ९ सीटें आदिवासी बहुल थीं। इनमें से भी ७ सीटें ऐसी थीं, जहां आदिवासियों की आबादी ५० प्रतिशत से ज्यादा थी।

पैâक्ट- 
- शहरी आबादी की बजाय आदिवासी वोटरों वाली सीटों पर नोटा के अधिकार का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है।
- पिछले चुनाव में प्रदेश की रतलाम लोकसभा सीट पर ३०,३६४ लोगों ने प्रदेश में सबसे अधिक नोटा को वोट दिया था। 
- मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में आदिवासी सीटों पर ज्यादा लोगों ने नोटा का उपयोग किया था।
नहीं पड़ता चुनाव पर असर
नोटा को मिले वोटों को रद्द माना जाता है। यानी इसका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ता। उदाहरण के तौर पर अगर किसी चुनाव में एक प्रत्याशी को ४० और दूसरे प्रत्याशी को ३० वोट मिले और नोटा को सबसे ज्यादा १०० वोट मिले, तो ऐसी स्थिति में भी नोटा के बाद सबसे अधिक वोट पाने वाले प्रत्याशी को विजय घोषित किया जाता है।