वाराणसी संसदीय क्षेत्र में 1980 का निर्वाचन सबसे रोचक चुनाव के रूप में याद किया जाता है। मैदान में थे दो दिग्गज प्रत्याशी। कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता पूर्व रेलमंत्री और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी को मैदान में उतारा था। दूसरी ओर से जनता दल (एस) के टिकट पर मुकाबला कर रहे थे वरिष्ठ समाजवादी नेता राजनारायण। राजनारायण उस देश ही नहीं दुनिया में चर्चा में आ चुके थे। उन्होंने 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली संसदीय क्षेत्र में करारी शिकस्त दी। इससे पहले राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध ठहरा दिया , जिससे राजनीतिक जगत में जबरदस्त हड़कंप मची।

पंडित कमलापति त्रिपाठी और राजनारायण रोजाना विभिन्न क्षेत्रों में छोटी-छोटी जनसभाएं करते थे। दोनों पक्षों से सघन प्रचार अभियान चल रहा था। उन दिनों राजनारायण के चुनाव अभियान में सक्रियता से जुटे सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री  शतरुद्र प्रकाश एक वाकया साझा करते हैं। शतरुद्र प्रकाश बताते हैं कि औरंगाबाद में राजनारायण की एक जनसभा थी। जनसभा का स्थल पंडित कमलापति त्रिपाठी के आवास के पास ही था। शाम को जैसे सभा शुरू हुई कुछ शरारती तत्वों ने पथराव शुरू कर दिया। राजनारायण जी ने तुरंत माइक संभाला और कहा कि ‘यह पत्थर नहीं मेरे लिए फूल है।’ इतना कह कर पत्थर का एक टुकड़ा जेब में रख लिया। उनकी यह टिप्पणी सुनकर पथराव करने वाले शार्मिंदा हो गए। वहां से भाग खड़े हुए।

काफी देर तक सभा चली। उनको सुनने के लिए भीड़ डटी रही। शतरुद्र प्रकाश कहते हैं कि उस समय प्रचार की मर्यादा थी। भाषा का ध्यान रखा जाता था। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी नहीं होती थी। सिद्धांत और नीतियों प्रहार होता था। राजनारायण कांग्रेस की कटु आलोचना करते थे। प्रचार के दौरान एकाध बार ऐसा अवसर आया कि राजनारायण और कमलापति त्रिपाठी आमने-सामने पड़ गए।  दोनों एक-दूसरे का हालचाल पूछा और हंसी-मजाक किया और आगे बढ़ गए। कहीं से कटुता नहीं थी। 

1980 का यह चुनाव काफी दिलचस्प था। कांटे का संघर्ष हुआ। उसी समय एक नारा ‘भागे रे हवा खराब हौ’ काफी चर्चा में रहा। चुनाव परिणाम को लेकर कोई पक्ष आश्वस्त नहीं था। मतगणना के दौरान काफी रोमांच था। अंतत: कमलापति त्रिपाठी ने 25 हजार वोटों से राजनारायण को शिकस्त दे दी।