पटना । बिहार में तीन चरणों के तहत 14 लोकसभा सीटों पर मतदान के बाद बाकी के चार चरणों के लिए चुनाव प्रचार और सघन हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच चुनावी सभाएं हो चुकी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अबतक चार बार आ चुके हैं। एनडीए और महागठबंधन के प्रदेश स्तरीय नेता मुस्तैदी से प्रचार में जुटे हुए हैं। प्रचार की सघनता को देखें तो एनडीए भारी पड़ रहा है।

दूसरी तरफ महागठबंधन के प्रचार में बहुत हद तक रणनीतिक चूक नजर आ रही है। मसलन, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भरसक मंच साझा करने से बचते हैं। दूसरी तरह एनडीए के किसी भी नेता को दूसरे से परहेज नहीं है। यहां तक कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने कटु आलोचक गिरिराज सिंह के लिए भी अपने उम्मीदवार की तरह वोट मांग रहे हैं।

मुद्दे स्थायी किस्म के हैं

विभिन्न चरणों के साथ मुद्दे बदल नहीं रहे हैं। नीतीश विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं। केंद्र सरकार की उपलब्धियों की चर्चा के बाद नीतीश सीधे अपने काम की सूची लेकर लोगों से कहते हैं कि उन्हें 13 साल के काम के एवज में मजदूरी चाहिए। संक्षिप्त भाषण में वे शराबबंदी, कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों का ब्योरा देते हैं।

अंत में लालू प्रसाद के उस कथित जंगलराज की याद दिलाना नहीं भूलते, जिससे निजात पाने के लिए लोगों ने 2005 में उन्हें सत्ता की चाबी सौंप दी थी। सड़क, बिजली और स्वास्थ्य की उपलब्धियां एनडीए के घटक दल साझे में करते हैं, जबकि रसोई गैस, आयुष्मान भारत योजना, जनधन योजना, कृषि बीमा सहित कुछ अन्य योजनाओं का जिक्र भाजपा के नेता बोनस के तौर पर करते हैं।

सवर्ण आरक्षण और एयर स्ट्राइक

वोटों की गोलबंदी का एक आधार सवर्ण आरक्षण भी है। चुनाव के पहले बेराजगारी का मुद्दा बड़ी तेजी से उभरा था। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के सवाल पर भी सवर्णों के एक हिस्से में नाराजगी थी। इसे बहुत हद तक सवर्ण गरीबों को दिए गए आरक्षण ने कम कर दिया है।

दूसरी तरफ पाक अधिकृत कश्मीर में किए गए एयर स्ट्राइक को चुनावी मुद्दा बना देने में भाजपा को कामयाबी मिल रही है। एनडीए के लिए अच्छी बात यह है कि विपक्ष के पास इस मुद्दे का काट नहीं है। विपक्ष इतना कहकर निकल जाता है कि एयर स्ट्राइक का श्रेय भारतीय सेना को है। भाजपा बेवजह इसे भुना रही है। राहत की बात यह भी है कि पूरे चुनाव में भाजपा से कोई राम मंदिर के बारे में सवाल नहीं करता है।  

महागठबंधन में कायम है फूट

एनडीए के लिए अच्छी बात यह भी है कि महागठबंधन का विवाद बीच चुनाव में भी कायम है। सुपौल और मधेपुरा में इस विवाद का दंश कांग्रेस की निवर्तमान सांसद रंजीत रंजन और बड़े नेता शरद यादव को झेलना पड़ा। रंजीत रंजन के क्षेत्र में राजद के बागी उम्मीदवार खड़े थे।

उधर मधेपुरा में पिछली बार राजद के टिकट पर जीते पप्पू यादव ने राजद के अधिकृत उम्मीदवार शरद यादव की जीत की संभावना पर सवाल खड़ा कर दिया है। इन दोनों क्षेत्रों में मतदान हो चुका है। उधर मधुबनी में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. शकील अहमद निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। महागठबंधन की गुटबाजी चुनाव प्रचार में भी नजर आ रही है। रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा की नजदीकी कांग्रेस के साथ है।

दूसरी तरफ हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी के नेता मुकेश सहनी राजद नेता तेजस्वी यादव के मंच पर अधिक सहज महसूस करते हैं। राहुल गांधी को छोड़कर महागठबंधन के गैर-कांग्रेसी घटक दल कांग्रेस के किसी प्रदेश नेता को अधिक तरजीह नहीं देते हैं। 

आरक्षण ही उनका भी मुद्दा है

महागठबंधन का सबसे बड़ा दल राजद आरक्षण और संविधान के सवाल पर चुनाव लड़ रहा है। तेजस्वी यादव अपनी हरेक सभा में चेतावनी देते हैं कि नरेंद्र मोदी अगर दोबारा सत्ता में आए तो सरकारी सेवाओं में दलितों-पिछड़ों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा। संविधान भी नहीं बचेगा।

असल में राजद इस लड़ाई को 1990 के मंडल आन्दोलन के स्तर पर ले जाना चाहता है, जब गैर-सवर्ण जातियां और मुसलमान लालू प्रसाद के नेतृत्व में गोलबंद हो गए थे। इस गोलबंदी ने लालू प्रसाद को लंबे समय तक बिहार की राजनीति में अजेय बनाकर रखा था, लेकिन आरक्षण के मुद्दे को मंडल आन्दोलन के स्तर तक ले जाने में व्यवहारिक कठिनाई यह आ रही है कि अति पिछड़ी जातियां मोटे तौर पर नीतीश को नेता मान रही हैं।

राजद के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि कैसे अति पिछड़ों को फिर से अपने पक्ष में गोलबंद करें। राजद ने नारा दिया है-मोदी नहीं, मुद्दे की बात करो। राजद वोटरों को याद दिला रहा है कि 2014 के चुनाव में हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था। 

कम वोट प्रतिशत से बेचैनी

प्रचार बेशुमार है। दोनों गठबंधन की ओर से सभी 40 सीटों पर जीत के दावे भी किए जा रहे हैं, लेकिन मतदान का कम वोट प्रतिशत दोनों गठबंधन को परेशान भी कर रहा है। तीन चरणों का मतदान 60 फीसद के आसपास है। यह नेताओं को डरा रहा है, क्योंकि किसी को सत्ता में लाने या किसी को सत्ता से बेदखल करने के लिहाज से मतदान का यह प्रतिशत कोई खास संकेत नहीं देता है।