राजस्थान के अजमेर शहर में सोमवार को 7 बहनों ने बेटियों को कमतर आंकने और कोख में ही मार डालने वाले समाज के सामने अनूठी मिसाल पेश की.

मामला शहर के मूंदड़ी मोहल्ले का है जहां एक महिला की मौत के बाद अंतिम यात्रा में अर्थी को कंधा देने से लेकर चिता को मुखाग्नि देने तक सारे सारे रस्मों रिवाज बेटियों ने ही पूरे किए. यह समाज के उन लोगों के लिए मिसाल है जो बेटियों के जन्म को अभिशाप मानते हैं और कई तो कोख में ही उनका कत्ल कर डालते हैं.

जानकारी के अनुसार अजमेर के मूंदडी मोहल्ले का यह मामला महेन्द्र चौहान के परिवार से जुड़ा हैं. चौहान के घर में संतान के नाम पर सिर्फ बेटियां ही हैं. वो भी एक दो नहीं सात-सात. लेकिन उन्हें बेटा नहीं होने का मलाल कभी नहीं रहा और उनकी पत्नी के देहांत के समय यानि सोमवार को भी ऐसा ही हुआ. 'बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ' की मुहिम यहां सार्थक होती नजर आई. चौहान परिवार की सातों बेटियों ने किसी बेटे की तरह अपनी मां माया देवी का अंतिम संस्कार किया और यह संदेश भी दिया कि बेटियां अभिशाप नहीं होती जब जरूरत होती है तो वे बेटे की भूमिका भी निभा सकती हैं.

सात बेटियों के कंधे पर निकली माया देवी की अंतिम विदाई:

अपनी दिंवगत मां की आत्मा को इन सातों बेटियों ने अंतिम वक्त पर भी बेटों की कमी नहीं खलने दी. सात बेटियों की मां माया देवी की संसार से आखिरी विदाई अपनी सात बेटियों के कंधे पर सवार होकर निकली. मूंदडी मोहल्ले से लेकर ऋषि घाटी मुक्तिधाम तक बेटियों ने अपनी मां को कंधे पर लेकर नम आंखो से विदाई दी और जीवन में उनके सीखाएं संस्कारों की पालना करते हुए समाज को संदेश दिया.

बेटियां बेटों से कम नहीं, समाज ने भी सराहा:

माया देवी की अंतिम यात्रा में बडी संख्या में लोग शामिल हुए जिन्होनें इस नजारे को देख समाज की बदलती सोच और तस्वीर की सराहना की. साथ ही बेटियों के इस कर्तव्य नि‌र्वहन के चर्चे भी शहर भर में रहे. अपनी मां की चिता को अग्नि देने के बाद नम आंखों के साथ ही सही लेकिन इन बेटियों ने अपनी मां के सीखाए संस्कारों को जीवन में आगे ले जाने और अपने बच्चों को सीखाने की बात कही और कहा कि जीवन में बेटा-बेटी के बीच में सिर्फ सोच का अंतर है.

 

मेरी पत्नी ने जो संस्कार अपनी बेटियों को दिए आज वो साकार हो गए. बेटा नहीं होने का आज तक कोई मलाल नहीं रहा. मुझे अपनी बेटियों पर गर्व है.

महेन्द्र चौहान, मृतका माया के पति