एक बार एक तीर्थिक ब्राह्मण नाना तीर्थ भ्रमण करते-करते दैवयोग से श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के पिताजी, श्रीजगन्नाथ मिश्रजी के घर आए। वह हमेशा आठ अक्षरों वाले गोपाल मन्त्र से गोपालजी की उपासना करते थे तथा जो भी मिलता उसे गोपालजी को भोग लगाकर ही प्रसाद ग्रहण करते थे।

 

ब्राह्मण को आया देख, श्रीजगन्नाथ मिश्र सम्भ्रम के साथ उठे और उन्हें प्रणाम किया। उनके चरण धोए तथा आसन इत्यादि प्रदान किया। उनकी पत्नी (श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की माताजी) श्रीमती शची ने रसोई के लिए सारी सामग्री ब्राह्मण को दे दी। ब्राह्मण ने बड़े ही प्रेम से अपने गोपालजी के लिए भोग पकाया। ज्योंही ब्राह्मण रसोई पकाकर ध्यान करके गोपालजी को भोग लगाने लगा त्यों ही बालक निमाई (श्रीचैतन्य महाप्रभुजी को बचपन में 'निमाई' कह कर पुकारा जाता था) घुटनों के बल चलते-चलते वहां आकर भोग खाने लगे। 

 

ब्राह्मण ने जब आंखें खोली तो देखा की बालक भोग खा रहा है। वह चिल्लाने लगे। सब घटना को देख श्रीजगन्नाथ मिश्रजी को गुस्सा आ गया। वे निमाई को मारने दौड़े, किन्तु ब्राह्मण ने उन्हें रोक दिया। मिश्रजी के द्वारा क्षमा प्रार्थना करने पर व अनुनय-विनय से ब्राह्मण दुबारा रसोई करने लगे। इधर श्रीजगन्नाथ मिश्र जी, निमाई को पड़ोसियों के घर ले गए ताकि निमाई पुनः कोई उत्पात न करे। लेकिन तीर्थिक ब्राह्मण ने जब गोपाल-मन्त्र से दोबारा गोपालजी को भोग निवेदन किया न जाने कहां से निमाई आ गए और भोग खाने लगे। निमाई को भोग खाते देख, ब्राह्मण 'नष्ट हो गया', 'नष्ट हो गया' बोलकर चिल्लाने लगे। यह सुनकर श्रीजगन्नाथ मिश्रजी बहुत मर्माहत हुए और निमाई को मारने को उद्यत हुए, तभी ब्राह्मण ने उन्हें रोका और कहा- बच्चे को बोध नहीं है। इसमें इसका कोई दोष नहीं है। मेरे ही भाग्य में शायद आज भोजन नहीं है। 

 

तीसरी बार निमाई के बड़े भाई श्रीविश्वरुप के अपूर्व रूप लावण्य एवं मधुर वाक्य से मुग्ध होकर व उनकी प्रार्थना पर फिर सफाई करके ब्राह्मण ने रसोई करना प्रारम्भ कर दिया। तब रात काफी हो जाने पर घर के सभी लोग निद्रामग्न हो चुके थे। ब्राह्मण दरवाजा बन्द किए रसोई कर रहे थे और श्रीजगन्नाथ मिश्रजी दरवाजे के बाहर बैठे चौकीदारी कर रहे थे। लेकिन उन्हें भी नींद आ रही थी। कुछ समय पश्चात् ब्राह्मण ने पहले की तरह गोपाल मन्त्र पढ़ा और भोग लगाने लगे। साथ ही साथ न जाने कहां से गोपाल-निमाई आकर चावल खाने लगे।

 

ब्राह्मण जब चिल्लाने को हुए तो निमाई ने तुरन्त कहा- आप कैसे भक्त हो? अपने आप मन्त्र करके मुझे बुलाते हो और जब मैं आता हूं तो चिल्लाते हो? इतना कहते-कहते ही महाप्रभुजी ने अपने भक्त तीर्थिक ब्राह्मण को अष्ट भुजा रूप से दर्शन दिए। ब्राह्मण ने देखा कि छोटे से बालक निमाई ने एक अद्भुत रूप धारण किया जिसमें अष्ट भुजाएं थी जो शंख़, चक्र, गदा, पद्म से व मुरली / माखन से युक्त थी अर्थात् उस समय उनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म थे, दो हाथों से वे मुरली पकड़े हुए थे तथा एक हाथ में उन्होंने ताजा मक्खन लिया हुआ था और दूसरे हाथ से खा रहे थे। बाद में श्रीचैतन्य महाप्रभुजी (बालक निमाई) ने ब्राह्मण से इस रहस्य को गुप्त रखने के लिए कह दिया।