मोदीजी को लालबत्ती नहीं हटवानी थी ..ये अहं को जिन्दा रखने वाली चमत्कारिक बत्ती थी़.. जो गाड़ी में बैठने वाली खादी की पोटली को निरन्तर अॉक्सिजन उपलब्ध करवाती थी .. ये नेता गाड़ी से उतर एक नजर इस बत्ती पर मारकर अपना कान्फीडेन्स डबल कर लेते थे .. लोग झुक झुक कर सलाम करते है , भीड़ मालाएं लिए इन्तजार मे खड़ी रहती है .. चमचे लालबत्ती के साथ उसी तरह दौडते है जैसे गांव के कुत्ते शहरो की कारों को तालाब तक छोडने जाते है .. ये सब लाल बत्ती के ही प्रभाव थे .. इन्ही कई दुर्लभ गुणों के चलते लालबत्ती कोहिनुर हीरे की श्रेणी में आने लगी जिसको प्राप्त करने के लिए मनुष्य की एक विशेष प्रजाति अपनी समस्त कलाऔ के साथ चिड़िया की आँख वाले अर्जुन की तरह लगी रहती थी .. खैर.. ,  अत्यधिक धन या अत्यधिक बल, इस लालबत्ती को पाने के दो सुगम रास्ते थे , योग्यता यहां मायने नहीं रखती.. हां, अफसरों की लालबत्ती की के लिए योग्यता जरूरी है .. वहां धन ,बल या भाग्य नही, मेहनत जरूरी है .. यहां एक शार्टकट था, मगर मोदीजी ने बत्ती गुल कर दी .. चलती गाड़ी से लालबत्ती उसी निर्दयता से निकाल दी जैसे कोई ..लाल सुर्ख ..धडकते दिल को .. गले में हाथ डाल कर खींच निकालता है..

खैर .. अफसोस उन सभी योग्य , कर्मठ , ईमानदार, धनशाली, बलशाली जनप्रतिनिधियों के लिए, जिनकी समस्त शक्तियां जस की तस रहने बावजूद कोहिनूरी प्यारी सी लालबत्ती सदा के लिए जा रही है..