फिल्म: मॉम

रेटिंगः 4 स्टार

डायरेक्टरः रवि उदयवार

कलाकारः श्रीदेवी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अक्षय खन्ना, अदनान सिद्दीकी और सजल अली

भगवान हर जगह नहीं हो सकता था, इसलिए उसने मां बनाई. ये लाइन सुनकर वाकई मां के लिए अपार स्नेह उमड़ पड़ता है और लगता है कि उसके आंचल में जाकर बैठ जाएं. ममतामयी मां मां अगर ठान ले तो अपने बच्चों की खातिर वह कुछ भी कर गुजर सकती है. यही, रवि उदयवार की फिल्म का थीम है. ऐसा बहुत ही कम मौकों पर होता है जब बॉलीवुड कहानी से लेकर कैरेक्टराइजेशन तक पर अपना दिमाग लगाता है. फिल्म में डायरेक्टर ने मेहनत की है. इस बात को इससे समझा जा सकता है कि कहानी काफी स्वाभाविक होते हुए भी, बांधे रखती है. श्रीदेवी की यह 300वीं फिल्म है और उन्होंने एक और शानदार फिल्म अपने नाम दर्ज कर ली है.

कहानी स्कूल टीचर श्रीदेवी की है. जो अपने पति और बेटियों के साथ शांति भरा जीवन जी रही होती है. लेकिन क्लास में एक स्टुडेंट टीचर की बेटी को गंदा क्लिप भेज देता है और टीचर उसके मोबाइल को खिड़की से बाहर फेंक देती है. बस इसके बाद उस लड़के को बात चुभ जाती है. टीचर की बड़ी बेटी उसके पति की पहली पत्नी की है तो वह खिंचाव मां-बेटी के रिश्ते में दिखता है. लेकिन वैलेंटाइंस डे पर जब वह बेटी पार्टी में जाती है तो उसके साथ कुछ ऐसा होता है कि सब की जिंदगी में तूफान आ जाता है. फिर एक मां अपनी बेटी का बदला लेने के लिए निकलती है और उस हद तक गुजर जाती है जिसके बारे में पुलिस अधिकारी से लेकर बड़े-बड़े अफसर तक सोच नहीं पाते. फिल्म की कहानी पहले ही सीन के साथ इंट्रस्ट जगाने लगती है. कहानी की पृष्ठभूमि दिल्ली की है. नाइट पार्टी से लेकर यंगस्टर्स की लाइफ को इसमें केंद्र में रखा गया है. फिल्म की कहानी निर्भया कांड की यादें ताजा करा देती हैं, और रौंगटे खड़ा करने का काम करती है.

श्रीदेवी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वे एक जानदार अभिनेत्री हैं. फिल्म में अगर कुछ मौकों पर उनकी कंपकंपाती आवाज और उच्चारण को छोड़ दें और सिर्फ उनकी एक्टिंग को देखें तो वे कमाल हैं. उन्होंने टीचर और एक मां के कैरेक्टर को इतने मंजे हुए अंदाज में निभाया है कि वह दिल को छू जाता है. स्क्रीन पर उनकी मजबूत मौजूदगी देखकर अच्छा लगता है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी का रोल छोटा लेकिन काफी महत्वपूर्ण है, और उनकी यह खासियत है कि वह अपनी छाप अच्छे से छोड़ जाते हैं. वे फिल्म में दरियागंज के लोकल डिटेक्टिव बने हैं, जिसे बूंदी का रायता पसंद है. कम समय की स्क्रीन प्रेजेंस के बावजूद डीके का उनका कैरेक्टर लंबे समय दर्शकों के जेहन में रहने वाला है. अक्षय खन्ना का पुलिस अधिकारी का कैरेक्टर ठीक-ठाक है. अदनान और सजल का काम भी अच्छा है.

फिल्म विषय आधारित होने के बावजूद कहीं बोर नहीं होती है और कोई सिर दुखाऊ संदेश नहीं देती है. यहां मां का महिमामंडन नहीं है, मां यहां एक्शन में है. फिल्म को मस्ट वॉच कहा जा सकता है और एक बात हमेशा याद रखना कि कभी किसी को मत कहना कि “अब बुला न अपनी मां को...”