देवभूमि हिमाचल में कई देव-देवताअों के मंदिर व झीलें स्थित हैं। वहीं मंड़ी में एक ऐसी झील है, जिसमें करोड़ों का खजाना है। कहा जाता है कि इस खजाने की रक्षा खुद नाग देवता करते हैं। इस झील का अंत छोर पाताल तक जाता है। मंड़ी जिले से 60 किलोमीटर दूर रोहांडा हैं, जहां से लगभग 8 किलोमीटर पैदल यात्रा करके इस झील तक पहुंचा जाता है।  

यहां हर साल 14-15 जून को मेला लगता है, जहां भक्तों की काफी भीड़ जुटती है। माना जाता है तब बाबा कमरुनाग दर्शन देते हैं। झील में भक्त सोने-चांदी के गहने अौर पैसे डालते हैं। माना जाता है कि इस झील के गर्त में अरबों का खजाना दबा पड़ा है। झील के पास ही बाबा कमरुनाग का मंदिर बना है, जिसे वर्षा का देवता माना जाता है। बाबा के नाम से ही इस झील को कमरूनाग झील के नाम से जाना जाता है। 

इस झील का जिक्र महाभारत में भी आता है। इन्हें बबरुभान जी के नाम से भी जाना जाता था। ये धरती के सबसे शक्तिशाली योद्धा थे। कहा जाता है कि जब पांडवों अौर कौरवों के मध्य युद्ध हो रहा था, तब इन्होंने कहा था कि ये इस युद्ध को देखेंगे अौर जो सेना हारेगी मैं उसका साथ दूंगा। भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि इस तरह तो कौरव जीत जाएंगे। श्रीकृष्ण ने एक शर्त लगाकर इन्हें हरा दिया अौर बदले में इनका सिर मांग लिया। लेकिन कमरुनाग ने एक ख्वाइश जाहिर की कि वे महाभारत का युद्ध देखेंगे। तब श्रीकृष्ण ने इनके कटे हुए सिर को हिमालय के ऊंचे शिखर पर रख दिया, लेकिन बाबा का सिर जिस तरफ घूमता वह सेना जीत की अौर बढ़ने लगती। इस समस्या को देखते हुए श्रीकृष्ण ने सिर को पत्थर बांधकर बाबा को पांडवों की अोर घुमा दिया। बाबा को पानी की दिक्कत न हो इसके लिए भीम ने अपनी हथेली को गाड़कर झील बना दी।

यह भी कहा जाता है कि झील में सोने-चांदी के गहने अौर पैसे चढ़ाने से मन्नत पूरी होती है। लोग अपने शरीर का कोई भी गहना यहां चढ़ा देते हैं। झील पैसों से भरी रहती है। इसे कोई नहीं निकालता क्योंकि इस पैसे को देवता का माना जाता है। यहां से कोई भी इस खज़ाने को चुरा नहीं सकता क्योंकि माना जाता है कि कमरुनाग के खामोश प्रहरी इसकी रक्षा करते हैं। एक नाग की तरह दिखने बाला पेड़ इस पहाड़ के चारों ओर है। जिसके बारे में कहते हैं कि जब कोई इस झील के खजाने को हाथ लगाता है तो ये नाग देवता अपने असली रुप में आ जाता है।