मौकापरस्ती, राजनीति की चौसठ कलाऔं में से एक है.. दूरदर्शी नेता , अपनी पार्टी की कुण्डली में राहू की वक्रदृष्टि को भांपकर, अपना घर बदल लेते है...,  ये समझदारी है, लोग भले ही भला बुरा कहे, पर उसका असर ना पहले होता था, ना अब.  वाघेला तो उदाहरण मात्र है, हजारों नेता इस मौकापरस्ती खेल के उस्ताद है,  राजनीति का धन्धा वंशानुगत चलना चाहिए.. चलता भी है,   अयोग्य पुत्र के कामधन्धे से लेकर घर बसाने तक, मां बाप को खासी मशक्कत करनी पड़ती है ..
चाहे शंकर सिंह हो या सोनिया गांधी
यहां कोशिश सब कर रहे है... और करनी भी चाहिए