गढ़ाकोटा। नगर मे लगातार बढ़ रही राहगीरो व आम लोगो को परेशानियो का सामना करना पढ रहा है नगर के पथरिया रोड पर दुकान वालो ने फुटपाथ पर अपना सामान बिछाये हुऐ है जिससे आऐ दिन सुबह  शाम जाम जैसी स्थिति रहती है दोनो ओर। शहर के प्रतिष्ठत दुकान मालिको के द्वारा  नियम कानून की कोई परवाह नही की जाती है उनको तो केवल अपने व्यापार की चितां रहती है आम लोग परेशान होते है तो होत रहै हमे कोई परवाह नही। इसी तरह नगर का प्रमुख मार्ग बसस्टैड से टाकीज चौराहा होते हुये रूई बजार पाठक मार्केट  होते हुऐ सराफा बजार एवं शहर के अन्य प्रमुख मार्गो पर अतिक्रमण फैला हुआ है जिस पर प्रशासन भी अनदेखी की स्थिति में है जो गरीब लोग ठेला लगा कर दो वक्त के खाना की व्यवस्था कर रहे थे उनको तो प्रशासन ने कार्यवाही कर हटा दिया गया गरीब तो हट गया लेकिन बडे दुकान वालो, सीमेन्ट लोहे एवं पाईप व अन्य दुकान वालो पर कब कार्यवाही आम नागरिको के मन मे सनसंय की स्थिति बनी हुई है क्या प्रशासन कार्यवाही कर यह संशय की स्थिति दूर करेगी।

   व्यक्ति अनंतकाल से इन्द्रियों का दास बना है
खुरई।
प्राचीन जैन मंदिर में आयोजित Óआत्मबोधÓ ज्ञानगंगा षिविर में विषाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिकारत्न पूर्णमति माताजी ने कहा कि व्यक्ति अनंतकाल से इन्द्रियों का दास बना है। इन्द्रियों के वषीभूत होकर मौज-मस्ती में अपना जीवन बर्वाद कर रहा है। वह इस बात को भलीभांति जानता है कि व्यक्ति अकेला आया है और अकेला ही जाएगा फिर भी सबको अपना मानता है। संपूर्ण   जीवन धन-दौलत जोडऩे में ही लगा रहता है। अंत में दोनों हाथ खाली ही जाता है। सिकंदर भी जब इस जहां से गया था तो उसके भी दोनों हाथ खाली थे।
आर्यिकाश्री ने कहा कि ऐसा नहीं कि व्यक्ति मरने के उपरांत कुछ अपने साथ नहीं ले जाता, जरूर ले जाता है उसने जीवन पर्यन्त तक जो अच्छे-बुरे कर्म किए उसके साथ ही इस दुनिया से अलविदा होता है और उन्हीं कर्मों के अनुसार उसे पुर्नजन्म लेना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने आपको बहुत समझदार समझता है परंतु वह वास्तव में मूर्ख षिरोमणी की तरह ही अपना आचरण एवं व्यवहार करता है। व्यक्ति को इतना भी निर्धन नहीं होना चाहिए कि वह दूसरों को दो मीठे शब्दों का उपहार ही न दे सके। जब भी हम किसी से मिलें तो ऐसी वाणी का प्रयोग करें जिससे उसके हृदय में आनंद उत्पन्न हो।
आर्यिकाश्री ने कहा कि ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करें, आपहुं शीतल होयÓ मधुर वाणी सुनने वालों को तो सुकून देती है बोलने वाले के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। वाणी में विनम्रता आपके परिवार का गौरान्वित करती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति बोलने की कला सीख जाए तो अपने व्यक्तित्व को निखार सकता है। एक अच्छे वक्ता के रूप में ख्याति अर्जित कर सकता है। लाखों व्यक्तियों को प्रभावित कर सकता है।
आर्यिकाश्री ने कहा कि जो लोग कोमल एवं मीठे शब्द उच्चारित करते हैं अवष्य ही उनका सांसारिक अनुभव उनके साथ होता है। सबल मन-मानस सुविचारों से परिपूर्ण होता है। जहां परिपूर्णता होगी वहां छिछलापन, कड़वापन और तीखापन तो हो ही नहीं सकता।
प्रवचन के पूर्व आचार्यश्री के चित्र का अनावरण संतोष जैन राहतगढ़ एवं नवयुवक मंडलों ने किया। शांतिधारा अभय कुमार एवं सुनील मालथौन ने की। ज्ञानदीप का प्रज्जवलन राजू नवीन एवं टुनटुन रोकडय़ा ने किया। प्रवचन सभा का संचालन सुनील पिठौरिया एवं सहयोग संकलन अषोक शाकाहार ने किया।