फिल्म का नाम : पार्टीशन 1947

डायरेक्टर: गुरिंदर चड्ढा

स्टार कास्ट: ह्यु बोनविल, हुमा कुरैशी, मनीष दयाल, गिलियन एंडरसन, ओम पूरी, राज जुत्शी, दर्शन जरीवाला

अवधि:1 घंटा 46 मिनट

सर्टिफिकेट: U /A

रेटिंग: 2.5 स्टार

बेंड इट लाइक बेकहम, ब्राइड एंड प्रिज्यूडीयस जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुकी गुरिंदर चड्ढा ने एक बार फिर से सच्ची घटना पर आधारित फिल्म ले कर आई हैं. भारत और पाकिस्तान के विभाजन पर बनी फिल्म 'द वाइसरॉय हाउस' जो 'फ्रीडम एट मिडनाइट' नामक किताब पर बेस्ड है और इसे भारत में पार्टीशन 1947 के नाम से रिलीज किया जा रहा है. गुरिंदर को उनकी अनोखी फिल्मों के लिए जाना जाता है. फिल्म देखने से पहले जानें, कैसी है फिल्म की कहानी...

कहानी

कहानी साल 1945 में बेस्ड है जब ब्रिटिश लोगों ने 300 साल तक भारत पर हुकूमत करने के बाद अंततः इसे आजाद करने का फैसला किया. उस पल आखिरी वाईस रॉय के रूप में लार्ड माउंबेटन (हयु बोनविल) को भारत भेजा गया और किस तरह से भारत और पाकिस्तान का विभाजन किया जाएगा. ये सबकुछ निर्धारित करने का काम शुरू हो गया. उसी बीच एक प्रेम कहानी भी चल रही थी जो आलिया (हुमा कुरैशी) और जीत सिंह (मनीष दयाल) के बीच की थी. लेकिन आलिया के अब्बा (स्वर्गीय ओम पूरी) ने अपनी दिवंगत पत्नी के कहने पर आसिफ (अरुणोदय सिंह) के साथ उसका निकाह तय किया था. बहुत सारे ट्विस्ट टर्न्स आते हैं, विभाजन होता है और कई सारे लोगों के घरों के बीच से रेडक्लिफ लाइन होकर गुजरती है और आखिरकार एक सरप्राइज भी सामने आता है जिसकी वजह से गुरिंदर ने ये फिल्म बनाई है, जिसका पता आपको फिल्म देखकर ही चलेगा.

जानें, कैसी है फिल्म

- फिल्म का डायरेक्शन बहुत बढ़िया है. सिनेमेटोग्राफी और लोकेशन बिल्कुल स्वतंत्रता से पहले के भारत को दर्शाते हैं और वही फील सामने आती है.

- हरेक किरदार ने बहुत ही उम्दा अभिनय किया है, चाहे वो माउंटबेटन के रूप में ह्यु बोनविल हो या उनकी पत्नी के रूप में गिलियन एंडरसन. वहीँ हुमा कुरैशी ने भी बहुत ही अलग अंदाज में अभिनय किया है. मनीष दयाल का काम काफी सहज है. दर्शन जरीवाला, राज जुत्शी और बाकी सभी सह कलाकार अच्छा अभिनय करते हुए नजर आये हैं. ओम पुरी साहब को देखकर एक अलग ही फीलिंग आती है. ओम पुरी ने फिल्म की शूटिंग और डबिंग तो पहले ही कर ली थी और उन्हें स्क्रीन पर देखते हुए ये फीलिंग आती है कि कितना बड़ा एक्टर हमारे बीच नहीं रहा.

- इतिहास के कई सारे मुद्दों की तरफ यह फिल्म ध्यान आकर्षित करती है. रेडक्लिफ लाइन की सच्चाई, गांधी जी, नेहरू, जिन्नाह के तर्क और संवादों को भी फिल्म का हिस्सा बनाया गया है. साथ ही किस तरह से हिन्दू मुस्लिम लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो गया था इसे भी फिल्म में दिखाया गया है.

- फिल्म की और अच्छी बात इसकी लेंथ है, जो पौने दो घंटे के करीब की है और चीजें सटीक तरीके से आगे बढ़ती जाती हैं.

- फिल्म का संगीत, खासतौर पर बैकग्राउंड स्कोर भी कमाल का है. दमादम मस्त कलंदर, दो दिलों जैसे गाने कहानी को आगे ले जाते हैं.

 

कमजोर कड़ियां

- कई लोग ऐसे हैं जो इतिहास के कई पन्नों को अपने-अपने अंदाज में देखते हैं और शायद उन्हें यह कहानी आकर्षित ना करें. खासतौर से इतिहास की तरफ रुझान रखने वालों को ही यह फिल्म थिएटर तक खींच पाएगी.

- फिल्म का फ्लेवर काफी डार्क है, जिसकी वजह से आजकल की मसाला फिल्मों को देखने वाली ऑडिएंस शायद बोर हो जाए, यही कारण है कि सबके लिए नहीं है 'पार्टीशन 1947'.

- विभाजन, राजनीतिक संवाद और अंग्रेजों की मनसा को पूरी तरह से दर्शा पाने में भी फिल्म कामयाब नहीं हो पायी है.

 

बॉक्स ऑफिस

फिल्म को हॉलीवुड में पहले ही रिलीज किया जा चुका है और अब भारत में रिलीज किया जा रहा है. पहले से ही अक्षय कुमार की 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' थिएटर में अच्छी चल रही है और बरेली की बर्फ़ी भी इसी हफ़्ते रिलीज़ हो रही है। इन वजहों से पार्टीशन 1947 की कमाई पर असर पड़ सकता है.