राजस्थान के दो पूर्व जाट राजघराने अब ओबीसी में शामिल हो गए हैं. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भरतपुर के पूर्व महाराजा विश्वेंद्र सिंह का परिवार भी अब अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल हो गया है. धौलपुर और भरतपुर के जाटों को राजस्थान सरकार ने ओबीसी में शामिल किया है. इसके साथ ही पूर्व जाट शासकों को भी इसका फायदा मिलेगा.

इन दो जिलों के जाटों को अब तक धौलपुर और भरतपुर में आजादी से पहले जाटों की हुकूमत की वजह से ही आरक्षण नहीं मिला था, जबकि राजस्थान में जाटों को आरक्षण 1999 में ही मिल गया था.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में भी इन दोनों जिले के जाटों को आरक्षण दिया था. लेकिन पहले राजस्थान हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था. उसकी वजह धौलपुर औऱ भरतपुर में आजादी से पहले जाट शासकों का राज थी.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खुद धौलपुर की पूर्व महारानी हैं. कांग्रेस नेता और विधायक विश्वेंद्र सिंह भरतपुर के पूर्व महाराजा हैं. विश्वेंद्र सिंह ही धौलपुर -भरतपुर के जाटों के आरक्षण की जंग लड़ रहे थे. अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के मापदंड की सबसे मुख्य शर्त है कि आरक्षण का दावा करने वाली जाति सामाजिक रूप से पिछड़ी होनी चाहिए. शासक जातियों को अब तक सामाजिक रुप से पिछड़ा नहीं माना गया जबकि दोनों जिलों में आजादी से पहले शासक जाट ही थे.

ये ही वजह रही कि राजस्थान में राजपूतों को अब तक आरक्षण नहीं मिला. जाटों के साथ ही राजपूतों ने 1999 में आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू किया था. लेकिन राजस्थान में धौलपुर और भरतपुर को छोड़कर अन्य जिलों में आजादी से पहले राजपूत राजाओं का शासन था. शासक की जाति से होने की वजह से राजपूतों को भी आरक्षण नहीं मिला. धौलपुर- भरतपुर के जाटों को आरक्षण के साथ ही राजपूत आरक्षण को लेकर आंदोलन कर रहे राजपूत आरक्षण मंच ने तो मांग की कि जिस आधार पर धौलपुर-भरतपुर के जाटों को ओबीसी में आरक्षण दिया उसी आधार पर राजपूतों को भी दें.

1999 में जब केंद्र औऱ राज्य में राजस्थान के जाटों को आरक्षण दिया गया तो धौलपुर और भरतपुर के जाटों को शासक जाति से होने की वजह से ही आरक्षण के लाभ से वंचित रखा गया. ऐसे में फिर कानूनी पेंच खड़ा हो सकता है. हालांकि धौलपुर और भरतपुर में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे जाटों का तर्क है कि आरक्षण देने का आधार जाटों के पिछड़ेपन की सर्वे रिपोर्ट है. ओबीसी कमीशन ने सर्वे कराया था.

आरक्षण की पहेली को सरकार जितना सुलझाती जा रही है उतनी ही ये उलझती जा रही है. बीजेपी के असंतुष्ट नेता घनश्याम तिवारी ने सवाल उठाया कि गुर्जरों को आरक्षण के लिए ओबीसी कोटा 21 से 26 फीसदी कर दिया गया तो फिर आर्थिक पिछड़ा वर्ग को आरक्षण क्यों नहीं दिया गया. 2015 में राजस्थान सरकार ने गुर्जरों के साथ ही आर्थिक पिछड़ा वर्ग 14 फीसदी आरक्षण का बिल पास किया था.