लखनऊ
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान लूट-मार के झूठे आरोप में सेना से निकाले गए एक मेजर को आर्म्ड फोर्स ट्राइब्यूनल से 33 साल बाद 71 साल की उम्र में न्याय मिला है। ट्रिब्यूनल ने सेना को 10 लाख रुपये हर्जाना और मेजर को लेफ्टिनेंट कर्नल पद देकर सभी भत्ते देने का फैसला सुनाया है।

मामले के मुताबिक, मेजर केए सिंह ने साल 1967 में मद्रास रेजीमेंट में कमीशन पाया। साल 1984 में उनकी तैनाती जालंधर में थी। इसी साल ऑपेरशन ब्लू स्टार के समय उनकी रेजिमेंट को आदेश मिला कि स्वर्ण मंदिर को उग्रवादियों से खाली करवाए। आदेश पर 26 मद्रास रेजिमेंट के 6 ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल केएमजी पन्नीकर के नेतृत्व में मंदिर में घुसे। मेजर केए सिंह टुकड़ी के दूसरे कमांडिंग ऑफिसर थे। सेना ने 6 जून 1984 को मंदिर उग्रवादियों से खाली करवा दिया औक मंदिर में मिले कुछ हथियार और इलेक्ट्रानिक आइटम सेना ने कब्जे में लिए।

इस दौरान मेजर केए सिंह पर आरोप लगे कि उन्होंने मंदिर से सामान लूटकर अपने पास रख लिया है। इस पर उन्हें कोर्ट मार्शल कर सेना से निकाल दिया गया। मेजर ने इसके खिलाफ साल 1989 में हाई कोर्ट में अपील दाखिल की, जो लखनऊ सेना न्यायालय ट्रांसफर कर दी गई। सेना न्यायालय की जस्टिस डीपी सिंह और एयर मार्शल अनिल चोपड़ा की पीठ ने 33 साल पुराने मामले पर सुनवाई करते हुए मेजर पर लगे सभी आरोप झूठे पाए।

गलती मानने का था दबाव
कोर्ट मार्शल के समय मेजर केए सिंह पर गलती मानने पर पदोन्नति दिए जाने का दबाव मनाया गया। मेजर ने दबाव में न आते हुए कोर्ट मार्शल के समय नॉट-गिल्टी के कॉलम पर साइन कर दिए। इस पर उन्हें सेना से निकाल दिया गया।

अशोक चक्र की फाइल गुम
ऑपरेशन ब्लू स्टार में मेजर केए सिंह के प्रदर्शन को देखते हुए उनका नाम अशोक चक्र के लिए नामित किया गया था। उन पर लगे आरोपों के बाद यह फाइल कहां गई, किसी को नहीं पता, जबकि ऑपरेशन में शामिल अन्य अधिकारियों को पदोन्नति दी गई।