सद्गुरु स्वामी आनंदजी
(आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषीय चिंतक)


टिप्स ऑफ द विक
1. बिल्व पत्रों की काले तिल मिले त्रिमधु (गो घृत, दुग्ध और मधु) से आहुति विचारों और कर्म में परिवर्तन के द्वारा आर्थिक कष्ट को नष्ट करने में सहायक होते हैं, ऐसा तंत्र और अग्निहोत्र के नियम कहते हैं।

2. किसी भी उपासना से पहले शरीर व वातावरण को महकाने वाले सुगंधों का प्रयोग विशेष सफलता प्रदान करते हैं, ऐसा मान्यताएं कहती हैं।

ये भी जानें
श्राद्ध पक्ष यानि पितृपक्ष का काल आत्मिक उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ है। भौतिक पदार्थों और धन-संपत्ति से संबंधित साधना और उपासना भी इस काल में अति उत्तम और बहुत प्रभावी मानी जाती है। इस पक्ष में की गई लक्ष्मी और कुबेर की साधना हमारे विचारों में सकारात्मक बदलाव लाकर हमारे कर्मों के द्वारा अकूत समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। इस कालखंड में धन की नियंत्रक शक्तियां जिन्हें यक्ष-यक्षिणी कहा जाता है, पूर्ण रूप से सक्रिय होते हैं। यह स्वयं की कार्य क्षमता में वृद्धि का काल माना जाता है।

प्रश्न: क्या श्राद्ध का पक्ष सिर्फ पितरों, पूर्वजों या मृत व्यक्तियों और आत्माओं का पखवाड़ा है? -विजय चंदेल

उत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि भाद्रपद का कृष्णपक्ष, जो श्राद्ध पक्ष या पितृपक्ष के नाम से जाना जाता है, अतिश्रेष्ठ काल है, ऐसा आध्यात्मिक मान्यताएं कहती हैं। आध्यात्म की दृष्टि से यह पक्ष ऐसी अद्भुत बेला है, जो अल्पप्रयास से ही सफलता और सकारात्मक परिणाम की साक्षी बनती हैं। यह पक्ष आत्मा और आत्मिक उन्नति का पुण्यकाल है। इस पक्ष का भूत-प्रेत या मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों से कोई संबंध है, यह धारणा गलत है। श्राद्ध, दरअसल अपने अस्तित्व को मान्यता और सम्मान देने की एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसे वक्त के साथ निर्बलों की मदद, प्राणायाम, सकारात्मक कर्मों और अन्य सामाजिक सुधारों की तरह कालांतर में आध्यात्मिक और धार्मिक चादर में लपेट दिया गया। पूरे वर्ष में से सिर्फ इसी पक्ष को इसके अद्भुत गुणों के कारण पितृ और पूर्वजों से जोड़ा गया है। इस पखवाड़े में स्थूल आनंद और भौतिक उत्सव जैसी गतिविधियों को महत्व नहीं दिया गया, क्योंकि आध्यात्मिक दृष्टिकोण भौतिक सफलता को क्षणभंगुर यानि शीघ्र ही मिट जाने वाला मानता हैं, और भारतीय दर्शन इतने कीमती कालखंड का इतना सस्ता उपयोग नहीं करना चाहता।

प्रश्न: मुझे बताया गया है कि हमारा नवजात बच्चा किसी बड़े ग्रहदोष से पीड़ित है। हम बहुत परेशान है। दोष से बचने का कोई उपाय बताइए। जन्मतिथि- 25.08.2017, जन्म समय- 12.48, जन्म स्थान- चंबा, हिमाचल प्रदेश। -सुनील भारद्वाज

उत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि आपकी बगिया के नन्हें पुष्प की राशि कन्या और लग्न वृश्चिक है। उसकी कुंडली में कर्मेश सूर्य कर्म भाव में ही अपने परम मित्र बुध के साथ विराजकर बुद्धादित्य योग और कुल दीपक योग से नवाज रहे हैं, वहीं बृहस्पति परम मित्र भाग्येश चंद्रमा के साथ लाभ भाव में अद्भुत गुरु चांदी योग बना रहे हैं। सप्तमेश शुक्र भाग्य भाव में परम मित्र चंद्रमा के घर बैठकर जहां उत्तम योग निर्मित कर रहा है, वहीं केतु पराक्रम भाव में आसीन होकर आपके पुत्र को सुपुत्र और पराक्रमी भी बना रहा है। मुझे तो आपकी बेटे की कुंडली में ग्रह दोष नहीं, बल्कि सुयोग ही सुयोग नजर आ रहे हैं। इतने छोटे बच्चे को लेकर ग्रहों के चक्कर में उलझना मन की दुर्बलता है। बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं। अभी तो पुत्र के आगमन के जश्न की खुमारी भी नहीं उतरी, आप किन चक्करों में उलझ गए। बेवजह की चिंता त्यागें, और नन्हें बच्चे के नैन-नक्श में स्वयं को तलाशने का आनंद लें।

प्रश्न: मंगनी होकर भी विवाह की बात नहीं बनी। पूजा-पाठ से भी कोई हल नहीं निकला। कोई उपाय बताएं, जिससे जल्दी विवाह हो जाए। जन्म तिथि- 03.09.1989, जन्म समय- 7.56, जन्म स्थान-मुंबई। -पुनीत मूंदडा

उत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि आप की राशि और लग्न दोनों कन्या है। आपकी पत्नी भाव का स्वामी बृहस्पति शत्रु बुध के घर कर्म भाव में विराजमान है। पराक्रमेश और अष्टमेश मंगल व्यय भाव में बैठकर जहां आपको मांगलिक बना रहा है, वहीं साथ में व्ययेश सूर्य की युति मंगल की तीव्रता में इजाफा भी कर रही है। अतः ऐसे लोगों का विवाह अमूमन देर से ही हो तो श्रेयस्कर है। अतः आप तनावमुक्त रहें। यदि वर मांगलिक हो, तो वधु का भी मांगलिक होना सुखी दांपत्य जीवन के लिए अनिवार्य शर्त है। विधाता का संकेत है कि 10 अप्रैल, 2018 से आरंभ होने वाली बृहस्पति की महादशा से आप पूर्ण विवाह योग के काल में कदम रखेंगे। वह समय आपके वैवाहिक प्रयास को गति और सार्थकता प्रदान करेगा। मस्तक, नाभि और जिह्वा पर केशर मिश्रित जल का लेपन, उपासना स्थल पर बादाम का दान, प्रातःकाल सर्वप्रथम गुनगुने जल के साथ शहद का सेवन और मीठी वस्तुओं का यथासंभव वितरण लाभ प्रदान करेगा, ऐसा मान्यताएं कहती हैं।