तीज त्यौहारों एवं उत्सवों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में हर रिश्ते का महत्वहै लेकिन पितरों का स्थान सवोपर्री एवं देवतुल्य है।  और शायद यही कारण है कि इस नश्वर संसार में ईश्वर ने हम मनुष्यों को अपने पितरों के प्रति श्रद्धा दर्शाने और पितरों के प्रति हमारे कर्तव्य को पूरा करने के अवसर स्वरूप कुछ विशेष दिन प्रदाय किये जिन्हें कि हम देशवासी अलग-अलग नामों से जानते हैं कहीं इन्हें कड़वे दिन के नाम से जाना जाता है तो कहीं  कनागत के संबोधन से,कोई श्राद्ध पक्ष मानता है तो कोई पितृ-पक्ष खैर कुछ भी कहते रहे लेकिन उद्वेश्य सिर्फ एक ही होता है और वो है अपने पितरों की मुक्ति और उनका आशिर्वाद पाना।

        मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए अपने परिजनों के निकट अनेक रूपों में आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा की शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है।

        ऐसी मान्यता है कि जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में पडऩे वाली उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

आधुनिकता के वेग में नई उम्र के कई लोगों को यह मालूम नहीं होता कि श्राद्ध किस तरह से किया जाता है और इससे जुड़े विधि-विधान क्या हैं? पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है।

हिंदू मान्यताओं और वैदिक परम्परा के अनुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने जीवित माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनकी बरसी पर तथा पितृपक्ष में उनका विधिवत श्राद्ध करें। विद्वानों के मुताबिक किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। पिंडदान के समय मृतक की आत्मा को अर्पित करने के लिए जौ या चावल के आटे को गूंथकर बनाई गई गोलाकृत्ति को पिंड कहते हैं।

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितृ को पिण्डदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख साधन तथा धन धान्यादि की प्राप्ति करता है। यही नहीं पितृ की कृपा से ही उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के पितृपक्ष में पितृ को आशा लगी रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। पितरों की पद वृद्घि तथा तृप्ति के लिए स्वयं श्राद्घ करना चाहिए। पितरों के लिए श्रद्घा से क्रमानुसार वैदिक पद्घति से शांत चित्त होकर किया कर्म श्राद्घ कहलाता है। शास्त्र में सुस्पष्ट है कि नाम व गौत्र के सहारे स्वयं के द्वारा किया श्राद्घ पितरों को विभिन्न योनियों में प्राप्त होकर उन्हें तृप्त करता है।

शास्त्रों का मत है कि देव-पितृ कार्यों में आलस्य नहीं करना चाहिए। पूर्वजों की कृपा से ही मनुष्य इस संसार में आता है और सुख ऐश्वर्य प्राप्त करता है। अत: जीवनकाल में उनकी सेवा करना तथा उनकी पावन स्मृति दिवस पर पितृ यज्ञ द्वारा श्राद्ध तर्पण अवश्य करना चाहिए। सामान्यत: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कद्दू की सब्जी, दाल-भात, पूरी व खीर बनाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद एक थाली में सजाकर गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना अति आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर ही पितरों को सही मायने में भोजन प्राप्त होता है, क्योंकि पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है।

इस बात में तो कोई संदेह नहीं कि हमारे पितरों-पूर्वजो ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है इसलिये अक्सर हम अपनी बातों में स्वयं व सामने वाले की सात पुश्तों को याद भी करते हैं। यहां महत्वपूर्ण है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए आखिर आज हम जिस स्थिति में हैं हमारे पास जो कुछ है वो उन्हीं के आशिर्वाद स्वरूप ही है।