यह फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित मराठी फिल्म फिल्म 'पोश्टर बॉयज़' का ही हिंदी रीमेक है। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह तीन लोगों की फोटो गलती से एक पोस्टर पर छप जाती है जिसमें वह पुरुष नसबंदी का विज्ञापन कर रहे हैं। इसके बाद इन तीनों ही व्यक्तियों की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है, यही फिल्म में रोचक तरीके से दिखाया गया है। फिल्म में प्रशासन, समाज और सरकार के ऊपर भी कटाक्ष किया गया है।

कहानी: फिल्म की कहानी जमघेटी नामक गांव पर आधारित है जहां रिटायर्ड अफसर जगावर चौधरी (सनी देओल), स्कूल मास्टर विनय शर्मा (बॉबी देओल) और क्रेडिट कार्ड कंपनी का वसूली करने वाला गुंडा अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपड़े) रहते हैं। इन तीनों की फोटो पुरुष नसबंदी का विज्ञापन करने वाले पोस्टर पर गलती से छप जाती है। इस घटना के बाद इन तीनों किरदारों में से एक की शादी टूट जाती है और दूसरे की पहले से तय शादी कैंसल हो जाती है। इसके बाद ये तीनों ही पीड़ित पुरुष इस बात की जांच करने में जुट जाते हैं कि आखिर उनकी तस्वीर पोस्टर पर कैसे छपी। इस दौरान फिल्म में प्रशासन विसंगतियां सामने आती हैं। इस दौरान यह तीनों ही लोग कई परेशानियों में घिर जाते हैं जिसे बड़े ही कॉमिक तरीके से फिल्म में दिखाया गया है।

रिव्यू: सनी देओल अब अपने समकालीन ऐक्टर्स के मुकाबले बूढ़े दिखने लगे हैं लेकिन उनकी अपनी चित-परिचित पंजाबी पुत्तर वाली इमेज अभी भी कायम है। बॉबी देओल ने भी 3 साल के लंबे अंतराल के बाद इस फिल्म से कम बैक कर रहे हैं। श्रेयस तलपड़े ने गुंडे के रोल में वही किया है जो इस तरह के बॉलिवुड किरदारों में अन्य ऐक्टर्स ने किया है। कहा जा सकता है कि श्रेयस ने फिल्म में कुछ भी नया नहीं किया है।

पोस्टर बॉयज फिल्म को लिखने वाले समीर पाटिल ने उत्तरी भारत के परिवेश को बेहतरीन ढंग से दर्शाया है और स्थानीयता को शानदार तरीके से पेश किया है, इसके लिए उन्हें पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। हालांकि इससे कोई बड़ा बदलाव होने की गारंटी नहीं है क्योंकि हम सांस्कृतिक रूप से बेहद जजमेंटल और अदूरदर्शी हैं। डायलॉग राइटर परितोष पेंटर ने कलाकारों के हिसाब से डायलॉग लिखकर बेहतरीन काम किया है। फिल्म में बलवंत नाम का एक किरदार है, जिसे कोई एक जोरदार आवाज में बुलाता है, 'बलवंत राय के कुत्ते।' इसके अलावा बॉबी देओल के किरदार ने फिल्म में अपने फोन के रिेंगटोन पर सोल्जर फिल्म के गाने को सेट कर रखा है। फिल्म में पुरुष नसबंदी की तुलना छोटी उंगली की सर्जरी से की गई है, जो कि सबसे मूर्खतापूर्ण तुलना है।