भोपाल में आज ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में तीन तलाक और बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर कुछ बड़े फैसले होने तय हैं। सूत्रों की मानें तो तीन तलाक पर बहस में शरीयत के मामले में कोर्ट का दखल बर्दाश्त नहीं होने की बात कहीं गई है।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ के फैसले के बाद पर्सनल लॉ बोर्ड की यह पहली मीटिंग है। बोर्ड की शुरू से यह राय रही है कि तीन तलाक का मसला शरीयत से जुड़ा है और सरकार या अदालत को शरीयत में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। इसी राय पर आज की बैठक में भी मुहर लग गई।

बैठक में शामिल आरिफ मसूद ने कहा कि बैठक में इस बात पर सहमति बन गयी है कि शरीअत में कोर्ट का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की राय है कि केंद्र सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ की धारा 25 के साथ न करें छेड़छाड़। यह धारा धार्मिक आजादी से जुड़ी है। इसी के साथ बैठक में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मोब लिंचिंग के खिलाफ कोर्ट में केस करने पर विचार कर रहा है। यह मुद्दा बैठक में उठा है। इस केस में सरकार को पार्टी बनाने पर चर्चा की गई है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने कहा कि केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टी अब हिंदू तथा मुसलमानों को लड़ाकर सियासी लाभ लेने की जुगत में है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में बोर्ड के 40 सदस्य हिस्सा ले रहे हैं। इनमें सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी हैं।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव वली रहमान ने कहा कि चाहे तीन तलाक का मामला हो या फिर बाबरी मस्जिद का मामला। हम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में इन फैसलों पर मुहर लगाएंगे। हमको बाहर का कोई हस्तक्षेप मंजूर नहीं है।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भोपाल में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की वर्किंग कमेटी की पहली मीटिंग हो रही है। इस बैठक में तीन तलाक और बाबरी मस्जिद विषयों पर चर्चा की जा रही है। भोपाल के इंद्रा प्रियदर्शिनी कॉलेज खानूगांव में इस मीटिंग में शामिल होने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना रब्बे हाशमी नदवी, महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी, उपाध्यक्ष डॉ. सईद कलबा सादिक, उपाध्यक्ष मोहम्मद सलीम कासमी, सचिव जफरयाब जिलानी और सांसद असदुद्दीन ओवैसी समेत वर्किंग कमेटी के सभी 40 से ज्यादा सदस्य पहुंचे हैं।

इस मीटिंग के एजेंडा में दो महत्वपूर्ण बिंदू सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक पर दिए गए फैसले और बाबरी मस्जिद शामिल हैं। एक दिनी मीटिंग में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक पर दिए गए फैसले पर अपने पक्ष पर निर्णय लेगी।

दूसरा बड़ा मुद्दा अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद है जिसमें हाल के दिनों में कुछ नए मोड़ आए हैं। पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉक्टर कल्बे सादिक ने बीते दिनों मुंबई के एक जलसे में कहा था कि अगर मस्जिद की पैरवी करने वाले सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या की विवादित जमीन का मुकदमा जीत भी जाएं तो भी उन्हें उस जगह को मंदिर बनाने के लिए दे देना चाहिए क्योंकि आप एक प्लॉट हारेंगे लेकिन इस तरह करोड़ों दिल जीतेंगे। यही नहीं मुकदमे में एक पक्षकार शिया वक्फ बोर्ड ने पिछले दिनों से लगातार यह मांग कर रहा है कि मुसलमान विवादित जमीन से अपना दावा वापस ले लें और उस जगह को मंदिर बनाने के लिए दे दें।

बोर्ड का कहना है कि मस्जिद अयोध्या फैजाबाद में किसी दूसरी जगह पर बना ली जाए जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा हो और लोग उसका इस्तेमाल करें। बोर्ड की राय यह भी है कि उस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद न रखा जाए बल्कि मस्जिदे अमन रखा जाए। इस बीच ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ और मुस्लिम संगठन भी यह राय दे रहे हैं कि विवादित जमीन को मंदिर बनाने के लिए दे दिया जाए। कई मुसलमानों का मानना है कि अगर उस जगह पर मस्जिद बनाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट दे भी दे तो भी वहां से रामलला की मूर्ति हटा करके मस्जिद बनाना मुमकिन नहीं होगा।

सामाजिक सद्भाव और व्यवहारिकता का यही तकाजा है कि उस जगह को मंदिर के लिए छोड़ दिया जाए। हालांकि अभी भी मस्जिद के पैरोकार कहते हैं कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और अदालत को ही यह तय करना चाहिए कि वहां पर क्या बनेगा। उन्हें लगता है कि कुछ लोगों ने पहले तो एक बनी बनाई मस्जिद को तोड़ दिया और उसके बाद उस जगह से उन्हें बेदखल करना चाहते हैं जबकि यह कानून और संविधान विरोधी कदम है। इन हालात में बोर्ड बाबरी मस्जिद को लेकर के विचार-विमर्श करेगा और अपनी राय जाहिर करेगा। पर्सनल लॉ बोर्ड की एग्जीक्यूटिव कमेटी में 51 लोग हैं। इसमें शिया सुन्नी और मुसलमानों के दूसरे और मुसलमानों के दूसरे फिरकों का प्रतिनिधित्व है।

ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने दुनिया में शिया मुसलमान के सबसे बड़े धर्म गुरु में से एक आयतुल्ला सीस्तानी से इराक से फतवा मंगाया है जिसमें कहा गया है कि अगर वहां पर सांप्रदायिक तनाव का अंदेशा है तो ऐसी जगह पर इबादत मुनासिब नहीं है। यही नहीं शिया वक्फ बोर्ड ने भी इरान और इराक से कुछ मुस्लिम धर्म गुरुओं से फतवे मंगाए हैं जिसमें इसी तरह की बात कही गई है। चूंकि बड़े पैमाने पर मुसलमानों का दूसरा पक्ष भी सामने आने लगा है, इसलिए यह बैठक और महत्वपूर्ण हो जाती है।