कलाकाररा   : जकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजली पाटिल, रघुबीर यादव
निर्देशक      : अमित मसुरकर
मूवी टाइप   : Comedy
अवधि         : 1 घंटा 46 मिनट
 
यकीनन यह साल ऐक्टर राजकुमार राव के लिए बेहद खास है। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद पहली बार इस साल राज कुमार की सबसे ज्यादा फिल्में रिलीज़ हो रही हैं। हाल ही में रिलीज़ हुई राजकुमार राव की 'बरेली की बर्फी' लोगों को खूब पसंद आई। कुछ समय पहले रिलीज़ हुई राजकुमार की फिल्म 'बहन होगी तेरी' बेशक बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई, लेकिन दर्शकों की एक क्लास ने इस फिल्म को सराहा और कम बजट में बनी उनकी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत बटोरने में भी कामयाब रही। राजकुमार के बारे में माना जाता है कि वह बॉलिवुड मसाला ऐक्शन फिल्मों के स्टार नहीं हैं और अगर ऐसा होता तो राज कभी 'ट्रैप्ड' जैसी फिल्मनहीं करते। इस फिल्म में राजकुमार की ऐक्टिंग की हर किसी ने जमकर तारीफ की। अब अगर उनकी इस नई फिल्म की बात करें तो एकबार फिर राजकुमार ने इस फिल्म में अपनी लाजवाब ऐक्टिंग और किरदार को अपने अंदाज में कुछ ऐसा जीवंत बना दिया है कि एकबार फिर राव इस फिल्म में अपनी बेहतरीन ऐक्टिंग के चलते इस अवॉर्ड के दावेदारों की लिस्ट में जरूर शामिल हो गए है। इस फिल्म को रिलीज़ से पहले जिस तरह क्रिटिक्स और दर्शकों की एक क्लास की जमकर तारीफें मिल रही हैं उसे देखकर लगता है कि फिल्म देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित फेस्टिवल में अपने नाम कई अवॉर्ड करने वाली है।

स्टोरी प्लॉट : न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) की अपनी बसाई अलग ही दुनिया है और वह अपनी इसी दुनिया में ही रहना चाहता है। मिडल क्लास फैमिली का न्यूटन कुमार उर्फ नूतन कुमार सरकारी नौकरी में है, लेकिन रिश्वत से कोसों दूर है। टाइम का इतना पक्का है कि डयूटी से पहले आना और काम पूरा करके जाना उसका नियम है। ऐसे में आदर्शवादी न्यूटन को भी लगता है कि वह अपनी कुछ खासियतों के चलते दूसरों से टोटली अलग है। घर वाले उसकी शादी करना चाहते हैं, लेकिन न्यूटन को जब पता चलता है कि लड़की की उम्र अभी 18 साल से कम है तो वह शादी करने से साफ इन्कार कर देता है। दरअसल, स्कूल कॉलेज की दुनिया से निकलने के बाद भी न्यूटन आज भी किताबों में लिखी बातों पर पर चलना पसंद करता है। राज्य में चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है सो न्यूटन को भी उसकी मर्जी से छत्तीसगढ़ के नक्सली हिंसा से बुरी तरह प्रभावित एरिया में पीठासीन अधिकारी बनाकर भेजा जाता है। दरअसल, छत्तीसगढ़ के इस बेहद पिछड़े इलाके में आज भी माओवादियों का चारों ओर खौफ है और माओवदियों ने इस बार यहां चुनाव का पूरी तरह से बॉयकाट किया हुआ है। वह नहीं चाहते कि यहां किसी भी सूरत में वोटिंग हो। न्यूटन यहां के एक छोटे से गांव के कुल 76 वोटरों से वोटिंग कराने के लिए अपनी टीम के हेलिकॉप्टर से साथ यहां आता है। यहां आने के बाद न्यूटन की टीम में यहीं से थोड़ी दूर एक स्कूल की टीचर माल्को (अंजली पाटिल) भी शामिल है। यहां आने के बाद इनकी टीम की सुरक्षा और वोटिंग कराने की जिम्मेदारी जिस सैनिक बटैलियन की लगती है उसका हेड आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) पर है, जिसका मानना है कि यहां वोटिंग कराने से कुछ होने वाला नहीं, सो न्यूटन के साथ बहस होती रहती है। न्यूटन के जोर देने पर आत्मा सिंह अपनी बटैलियन के साथ कैम्प से करीब आठ किमी दूर घने जंगल में एक वीरान पड़े सरकारी स्कूल के एक कमरे में मतदान केंद्र बनाता है और फिर शुरू होता है वोटरों के आने का इंतजार । फिल्म की कहानी शुरू से अंत तक आपको बांधने का दम रखती है। करीब पौने दो घंटे की फिल्म कई बार आपको देश की चुनाव प्रणाली , सरकारी अफसरों की सोच और सिक्यॉरिटी फोर्स के नजरिये के बारे में सोचने पर बाध्य करेगी। न्यूटन एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों की एक खास क्लास के लिए है, जिन्हें रिऐलिटी को स्क्रीन पर देखना पंसद है। वहीं तारीफ करनी होगी यंग डायरेक्टर अमित मसुरकर की जिन्होंने एक कड़वी सच्चाई को बॉलिवुड मसालों से दूर हटकर पेश किया है। यही वजह है कि फिल्म के कई सीन आपको सोचने पर मजबूर करेंगे। ऐसा भी नहीं कि फिल्म बेहद गंभीर सब्जेक्ट पर बनी है और इसमें आपको गुदगुदाने के लिए कुछ नहीं है। पकंज त्रिपाठी और राजकुमार राव के संवादों को सुनकर आप कई बार हंसेंगे।

ऐक्टिंग: राजकुमार राव ने न्यूटन के किरदार को बखूबी निभाया है। सच कहा जाए तो राव ने न्यूटन के किरदार में अपनी मासूमियत और फेस एक्स्प्रेशन से जान डाल दी है। आत्मा सिंह के रोल में पकंज त्रिपाठी खूब जमे हैं। वहीं रघुवीर यादव भी अपने रोल में सौ फीसदी परफेक्ट हैं तो अंजली पाटिल ने अपने किरदार की डिमांड के मुताबिक किरदार को निभाया है। फिल्म का रियल लोकेशन पर शूट किया गया है सो लोकेशन का जवाब नहीं। 'चल तू अपना काम कर ले' गाना फिल्म के माहौल और स्ब्जेक्ट पर फिट है।