हिंदू परिवारों में नवरात्रे के पहले दिन घट स्थापना की जाती है, जिसमें ज्वार अर्थात जौ अर्थात खेत्री बीजी जाती है। जौ जीवन में सुख और शांति का प्रतीक होते हैं क्योंकि देवियों के नौ रूपों में एक मां अन्नपूर्णा का रूप भी होता है। जौ की खेत्री का हरा-भरा होना इस बात का प्रतीक है कि इसी तरह जीवन भी हरा-भरा रहेगा और साथ ही देवी की कृपा भी बनी रहेगी। घट स्थापना सुबह ही करें और इसकी स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। दुर्गा पूजन का आरंभ घट स्थापना से प्रारंभ हो जाएगा,

शारदीय नवरात्र घट स्थापना मुहूर्त- 6:12 से 08:09

अवधि- 1 घण्टा 56 मिनट

20 सितंबर को होगा प्रतिपदा तिथि का प्रारम्भ-10:59 बजे
21 सितंबर को प्रतिपदा तिथि समाप्त-10:34 बजे


पूजन विधि- सर्वप्रथम स्नान कर गाय के गोबर से पूजा स्थल का लेपन करें। घट स्थापना के लिए एक अलग चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं तथा इस पर अक्षत से अष्टदल बना कर एक बर्तन में जौ बीजें तथा इसके बीच में अपनी इच्छानुसार मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का जल से भरा कलश स्थापित करें।


बीजे हुए जौ को आम या आक के पत्तों से ऊपर से ढक दें। जब जौ अंकुरित हो कर बाहर निकलने शुरू हो तो इन पत्तों को हटा दें। यदि पूर्ण विधिपूर्वक घट स्थापना करनी हो तो पंचांग पूजन (गणेश-अंबिका, वरुण, षोडशमातृका, सप्तघृतमातृका, नवग्रह आदि देवों का पूजन) तथा पुण्याहवाचन (मंत्रोच्चार) ब्राह्मण द्वारा कराएं अथवा स्वयं करें।


इसके बाद देवी की मूर्ति स्थापित करें तथा उसका षोडशोपचार पूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्री दुर्गा सप्तशती का संपुट अथवा साधारण पाठ करें। पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन अथवा दशांश पाठ करना चाहिए। नवरात्रे के आखिरी दिन कन्या पूजन के बाद जौ के पात्र का विसर्जन करें।