नई दिल्ली: जर्मनी की 59 वर्षीय नागरिक फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग देश के लिए एक मिसाल बन कर सामने आई हैं। लेकिन सबसे बड़ी मिसाल वो उन गौरक्षकों के लिए बनी हैं जो गाय की रक्षा के मान पर हिंसा करते नजर आते हैं। फ्रेडरिक 1,200 गायों की देखरेख कर रही हैं जिनमें से अधिकतर गायें बीमार, घायल और छोड़ दी गई हैं।

एक गाय से हुई शुरूआत
फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग 1978 में बर्लिन से भारत में घूमने आई थीं। तब वो महज 20 साल की थीं। वह थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया और नेपाल की सैर पर भी गईं लेकिन उनका मन ब्रज में आकर ही लगा। वह एक गुरु की तलाश में राधा कुंड गईं क्योंकि उनका मानना था कि गुरू के बिना जिंदगी में आगे बढ़ना संभव नहीं। उसके बाद उन्होंने पड़ोसी के आग्रह पर एक गाय खरीदी। फ्रेडरिक का कहना है कि उसके बाद से मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। इसके बाद उन्होंने गायों पर किताबें खरीदीं और हिन्दी सीखी। उन्होंने बताया कि जब गाय बूढ़ी हो जाती है और दूध देना बंद कर देती है तो लोग उसे छोड़ देते हैं। ऐसी ही गायें की वो देखभाल करती हैं।

फ्रेडरिक से बनी सुदेवी
फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग को यहां के लोग प्यार से सुदेवी माताजी कहते हैं। उन्होंने एक गौशाला शुरू की जिसका नाम सुरभि गौसेवा निकेतन है। यहां राधे कुंड में गायों और बछड़ों के एक विशाल परिवार का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वे हमारे बच्चों के जैसे हैं और मैं उन्हें नहीं छोड़ सकती।

हर महीने 25 लाख रुपये का आता है खर्च
यदि कोई  गाय 3,300 वर्ग गज में फैली गौशाला में आ जाती है तो उसे खाना और दवा मुहैया करा कर उसकी पूरी देखभाल की जाती है। उन्होंने कहा कि आज, हमारे पास 1,200 गायें और बछड़े हैं। और अधिक गायों को रखने के लिए हमारे पास जगह नहीं है। लेकिन जब कोई बीमार या घायल गाय को मेरे आश्रम के बाहर छोड़कर जाता है तो मैं इनकार नहीं करती और उसे अंदर ले आती हूं। गौशाला में 60 लोग काम करते हैं. उनका परिवार भी गोशाला से ही चलता है। हर महीने गौशाला पर करीब 25 लाख रुपये खर्च होते हैं। यह धनराशि वह बर्लिन में अपनी पैतृक संपत्ति से मिलने वाले सालाना किराए और यहां से मिलने वाले दान से जुटाती हैं।