नवरात्र के दूसरे दिन द्वितीय दुर्गा ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाता है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ब्रह्म का आचरण करने वाली। दुर्गा के दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी पर मंगल ग्रह पर अपना आधिपत्य रखती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी उस बच्चे की अवस्था को संबोधित करती हैं जो अब बड़ा हो रहा है, विद्यार्थी है व जिसका उद्देश शक्ति प्राप्त करना है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप खिलते कमल जैसा है जिसमें से प्रकाश निकल रहा है। इनका रूप ज्योर्तिमय, शांत व निमग्न होकर तप में विलीन है। इनके मुखमंडल पर कठोर तप के कारण अद्भुत तेज व कांति है। इनके दाहिने हाथ में अक्षमाला व बाएं हाथ में कमण्डल है। यह साक्षात ब्रह्मत्व का स्वरूप हैं। गौरवर्णा देवी ने ध्वल रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं। देवी के कंगन, कड़े, हार, कुंडल तथा बाली आदि सभी जगह कमल जड़े हुए हैं। 


ब्रह्मचारिणी का यह स्वरुप माता पार्वती को वो चरित्र है, जब उन्होंने शिव अर्थात ब्रह्म को साधने हेतु तप किया था। देवी ब्रह्मचारिणी की साधना का सम्बंध मंगल ग्रह से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में मंगल का संबंध प्रथम और आठवें भाव से होता है अतः इनकी साधना का संबंध व्यक्ति के बुद्धि, मानसिकता, आचरण, देहिक सुख, निष्ठा, सेहत, आयु, बुद्धिमत्ता से है।


वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार इनकी साधना का संबंध अंगारकाय से है, इनकी दिशा दक्षिण है। इनकी साधना का सर्वश्रेष्ठ समय हैं ब्रह्म मुहूर्त। इनकी पूजा लाल-सफ़ेद आभा लिए मिश्रित पुष्पों से करनी चाहिए। इन्हें गेहूं से बने मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। इनकी साधना से मंदबुद्धियों को कुशाग्रता प्राप्त होती है। इनकी साधना कॉम्पिटिशन व एक्साम्स में सफलता के साथ-साथ लक्ष्य को साधने के लिए भी की जाती है। देवी ब्रह्मचारिणी की साधना सर्वाधिक रूप से उन लोगों को फलित होती है जिनकी आजीविका का संबंध चिकित्सा, इंजीनियरिंग, मैकेनिकल, सुरक्षा सेवा से है।