दुर्गा के सातवें स्वरूप में देवी कालरात्रि शनि ग्रह पर अपना आधिपत्य रखती हैं। कात्यायिनी का स्वरुप वृद्धावस्था का अनुभव लिए उस वृद्ध महिला व पुरुष का है जो पौत्रादी का सुख लेते हुए काल से लड़ रहा है। शास्त्रनुसार देवी कालरात्रि का यह स्वरूप अत्यंत भयंकर है, जो मात्र पापियों का नाश करने हेतु है। देवी अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करती हैं अतः इन्हें शुभंकरी कहते हैं। कहते हैं की जो जातक सातवें नवरात्र के दिन मां कालरात्रि का पूजन करता हैं वह समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। 


पौराणिक मतानुसार कालरात्रि ही महामाया व भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं। देवी कालरात्रि ने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है। शब्द कालरात्रि का अर्थ है काल की रात्रि अर्थात मृत्यु का अंत या काल का अस्त होना। शास्त्रनुसार देवी का रंग काजल के समान अंधकार की भांति कालिमा लिए हुए है। देवी त्रिनेत्री हैं तथा इनके शरीर से बिजली की भांति किरणें निकल रही हैं। कंठ में विद्युत माला लिए देवी के खुले व बिखरे बाल हवा में लहरा कर डर पैदा करते हैं। चतुर्भुजी देवी गर्दभ पर सवार हैं तथा अपनी उपरी दाईं भुजा से भक्तों को वरदान देती हैं व नीचे की दाईं भुजा से अभय का आशीर्वाद देती हैं। बाईं भुजा में क्रमश: तलवार व खड्ग धारण किया है। देवी कालरात्रि की साधना का संबंध शनि ग्रह से है। 


कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में शनि ग्रह का संबंध दशम और एकादश भाव से होता है अतः देवी की साधना का संबंध कर्म, प्रोफेशन, पितृ, पिता, आय, लाभ, नौकरी से है। 


वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार देवी की दिशा पश्चिम है, निवास में बने वो स्थान जहां पर शयनकक्ष व भंडार है। देवी की साधना ग्रह बाधाओं को दूर करती है। व्यक्ति का आलस्य दूर होता है, कर्म क्षेत्र मज़बूत होता है, पदोन्नति व धन लाभ मिलता है। देवी कालरात्रि की साधना उन लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ है जिनकी आजीविका का संबंध कंस्ट्रक्शन, मैकेनिकल, इंजीनियरिंग, हार्डवेयर अथवा पशुपालन से है।


शुभकामनाओं की पूर्ति के लिए करें इस मंत्र का जाप
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥