यूं तो सभी पूर्णिमा की रात बहुत ही हसीन होती है लेकिन इनमें शरद पूर्णिमा की रात की सुंदरता के क्या कहने। पुराणों तो यहां तक कहा गया है कि इसकी सुंदरता को निहारने देवता भी धरती पर आते हैं। बरसात के बाद धुले आसमान से छिटकती चांदनी न केवल मनमोहक होती है। बल्कि ऐसी मान्यता है कि इस रात छिटकती चांदनी से अमृत की बूंदें भी धरती पर गिरती हैं।

इसी मान्यता के कारण युगों से परंपरा चली आ रही है कि शरद पूर्णिमा की रात चावल से बनी खीर को छन्नी से ढ़ककर खुले आसमान में रखना चाहिए। दूध, चावल, चीनी इनका संबंध चांद और देवी लक्ष्मी से है।

इस खीर को अगले दिन सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। पौराणिक मान्यता है कि इस खीर में अमृत का अंश होता है जो आरोग्य सुख प्रदान करता है। इसलिए स्वास्थ्य रूपी धन की प्राप्ति के लिए शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाना चाहिए। जबकि आर्थिक संपदा के लिए शरद पूर्णिमा को रात्रि जागरण का विधान शास्त्रों में बताया गया है।

यही कारण है कि इसे को-जागृति यानी कोजगारा की रात भी कहा गया है। कहते हैं कि इस रात देवी लक्ष्मी सागर मंथन से प्रगट हुईं थी। इसलिए इसे देवी लक्ष्मी का जन्मदिवस भी कहते हैं। अपने जन्मदिन के अवसर पर देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आती हैं। इसलिए जो इस रात देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं उन पर देवी की असीम कृपा होती है।

इस रात देवी लक्ष्मी की पूजा कौड़ी से करना बहुत ही शुभ फलदायी माना गया है। जो लोग धन एवं सुख-शांति की कामना रखते हैं वह इस अवसर पर सत्यनारायण भगवान की पूजा का आयोजन कर सकते हैं।