कामदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि, "हे वासुदेव ! मैं बड़े-बड़े ऋषियों, मुनियों तपस्वियों और ब्रह्मचारियों को हरा चुका हूं। मैंने ब्रह्माजी को भी आकर्षित कर दिया। शिवजी की भी समाधि विक्षिप्त कर दी अब आपकी बारी है।"


भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "अच्छा! मुझ पर तू अपनी शक्ति का जोर देखना चाहता है।"


जब चन्द्रमा पूर्ण कलाओं से विकसित हो, शरद पूनम की रात हो, तब तुझे मौका मिलेगा। शरद पूनम की रात आई और श्रीकृष्ण ने बजाई बंसी। बंसी में श्रीकृष्ण ने 'क्लीं' बीजमंत्र फूंका। क्लीं बीजमंत्र फूंकने की कला तो भगवान श्रीकृष्ण ही जानते हैं। यह बीजमंत्र बड़ा प्रभावशाली होता है। श्रीकृष्ण हैं तो सबके सार और अधिष्ठान लेकिन जब कुछ करना होता है न तो राधा जी का सहारा ढूंढते हैं।

 

राधा भगवान की आह्लादिनी शक्ति है। भगवान बोले, "राधे देवी ! तू आगे-आगे चल। कहीं तुझे ऐसा न लगे कि ये गोपिकाओं में उलझ गए, फंस गए है। तुम भी साथ में रहो। अब युद्ध करना है। काम बेटे को जरा अपनी विजय का अभिमान हो गया है। तो आज उसके साथ दो दो हाथ होने हैं।" 


भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजायी, क्लीं बीजमंत्र फूंका। 32 राग, 64 रागिनियां। शरद पूनम की रात, मंद-मंद पवन बह रही है। राधा रानी के साथ हजारों सुंदरियों के बीच भगवान बंसी बजा रहे हैं। कामदेव ने अपने सारे दांव आजमा लिए सब विफल हो गए।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "काम ! आखिर तो तू मेरा बेटा ही है !"


वही काम भगवान श्रीकृष्ण का बेटा प्रद्युम्न होकर आया। कालों के काल, अधिष्ठानों के अधिष्ठान तथा काम-क्रोध, लोभ मोह सबको सत्ता-स्फूर्ति दने वाले और सबसे न्यारे रहने वाले भगवान श्रीकृष्ण को जो अपनी जितनी विशाल समझ और विशाल दृष्टि से देखता है, उतनी ही उसके जीवन में रस पैदा होता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन के विध्वंसकारी, विकारी हिस्से को शांति, सर्जन और सत्कर्म में बदल के, सत्यस्वरूप का ध्यान और ज्ञान पाकर परम पद पाने के रास्ते सजग होकर लग जाए तो उसके जीवन में भी भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला होने लगेगी।

 

नर्तक तो एक हो और नाचने वाली अनेक हों, उसे रासलीला कहते हैं। नर्तक एक परमात्मा है और नाचने वाली वृत्तियां बहुत हैं। और नाचने वाली नाचते-नाचते नर्तक में खो जायें और नर्तक को खोजने लग जायें और नर्तक उन्हीं के बीच में, उन्हीं के वेश में छुप जाय-यह बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है।


बांसरी बजाय आज रंग सो मुरारी । 
श्रीवृंदावन बन्सी बजी तीन लोक प्यारी । 
ग्वाल बाल मगन भयी व्रजकी सब नारी ॥
शिव समाधि भूलि गये,मुनि मनकी तारी ... 
मुरली गति बिपरीत कराई।
तिहुं भुवन भरि नाद समान्यौ राधारमन बजाई॥
बछरा थन नाहीं मुख परसत, चरत नहीं तृन धेनु। 
जमुना उलटी धार चली बहि, पवन थकित सुनि बेनु॥
बिह्वल भये नाहिं सुधि काहू, सूर गंध्रब नर-नारि।
सूरदास, सब चकित जहां तहं ब्रजजुवतिन सुखकारि॥