-निर्माता: भूषण कुमार
-निर्देशकः राजा कृष्णा मेनन
-सितारेः सैफ अली खान, पद्मप्रिया जानकीरमन, स्वर कांबले, मिलिंद सोमण
रेटिंग ***1/2

आप खाने-पीने के शौकीन हैं तो शेफ देखते हुए बार-बार मुंह में पानी आएगा। यह भूख जगाती है। आरंभ से अंतः तक इसमें स्वादिष्ट भोजन का जिक्र और दर्शन है। यह 2014 में इसी नाम से बनी निर्देशक जोन फेवरयू की अमेरिकी फिल्म का रीमेक है। मगर अंदाज पारिवारिक भारतीय फिल्मों वाला है। यहां इमोशन का सही तड़का लगा है। सही जगह पर सही मसालों का इस्तेमाल हुआ है। तलाकशुदा पति-पत्नी और उनके किशोरवय की तरफ बढ़ते बेटे की इस कहानी में बाकी किरदार भी अपनी जगहों पर फिट हैं।

 

कहानी का दायरा इतना घेरदार है कि कहीं यह लचर भी हो सकती थी परंतु स्क्रिप्ट और संपादन कसे हुए हैं। अतः फिल्म बांधे रखती है। शेफ अमेरिका के ‘गली रेस्त्रां’ में लोगों को अपने व्यंजनों से दीवाना बनाने वाले रोशन कालरा की कहानी है। सैफ अली खान ने 2012 में मुंबई के ताज होटल में एक एनआरआई बिजनेसमैन को घूंसा मार कर उसकी नाक तोड़ दी थी। फिल्म में वह अपने बनाए खाने की आलोचना करने वाले एक अमेरिकी की नाक पर घूंसा मारते हैं, हवालात में वक्त गुजारते हैं और नौकरी खो बैठते हैं।

 

केरल आकर पूर्व पत्नी राधा (पद्मप्रिया जानकीरमन) और बेटे अरमान के संग रहते हुए रोशन को एहसास होता है कि जिंदगी में क्या कमी है। कुछ समय रह कर रोशन अमेरिका लौटना चाहता है मगर राधा और उसके दोस्त (मिलिंद सोमण) की सलाह पर फूड-ट्रक शुरू करता है। यहां पिता-पुत्र के रिश्तों के एक अलग स्तर पर जाने से फिल्म की खूबसूरती बढ़ती है। पता चलता है कि दिल्ली का रोशन कालरा शेफ बनने के लिए घर छोड़ कर भागा था क्योंकि पिता को लगता था, रसोईया बनना भी क्या कोई करिअर है?

 

फिल्म में रोशन-राधा का रिश्ता खत्म होने के बाद भी उसमें एक-दूसरे के लिए गहरा सम्मान और संवेदना है। यह बात फिल्म को जीवंत बनाए रखती है। निसंदेह यह सैफ की बेहतरीन भूमिकाओं में है और उन्होंने परिपक्व ढंग से इसे निभाया। इसी राह पर वह लंबी पारी खेल सकते हैं। बॉलीवुड फिल्मों में साइज जीरो के आस-पास की दूधिया-गोरी अभिनेत्रियों को देख आपकी आंखें चौधियाई हैं तो मलयालम ऐक्ट्रेस पद्मप्रिया की उपस्थिति सुकून देगी। संतुलित किरदार में वह न सैफ पर हावी हैं और न दर्शकों पर।

 

पद्मप्रिया और मिलिंद की संयमित मित्रता का ट्रेक आकर्षक है। मिलिंद छोटे मगर रोचक रोल में हैं। स्वर कांबले सैफ के बेटे के रोल में सहज हैं। मसाला बॉलीवुड फिल्में बनाने या अपनी ही लीक पीटते रहने वाले डायरेक्टरों को राजा कृष्णा मेनन से सीखा चाहिए कि कैसे विविध विषय संभाले जाते हैं। मेनन ही एयरलिफ्ट के निर्देशक थे। शेफ में गीत-संगीत की गुंजायश होते हुए भी वह कुछ कमजोर है। हालांकि इससे फिल्म पर फर्क नहीं पड़ा। शेफ एक बढ़िया स्वादिष्ट थाली की तरह संतुष्ट करती है।