लोक आयोग रिपोर्ट से खुलासा, बेलगाम थे डीन और डीएमई
बिलासपुर।
लोक आयोग रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार सिम्स में लिपिक और अलिपिक श्रेणी कर्मचारी भर्ती 2013 के दौरान भारी अनियमितता हुई है। सिम्स अधिकारियों ने नियम के खिलाफ चहेतों को सरकारी सेवा में आने का मौका दिया। योग्यता को ठेंगा दिखाकर अयोग्य बनाकर बाहर कर दिया है। फर्जी तरीके से चयन समिति का गठन किया गया। सिम्स प्रबंधन ने शासन के निर्देशों को ताक पर रखकर चहेतों को सरकारी सेवा का अवसर दिया। बिना शासन के अनुमोदन चयन समिति में गैर जिम्मेदार लोगों को शामिल किया। लोकअयोग ने जांच के बाद रिपोर्ट शासन को सौंप दिया है। बावजूद इसके अभी तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। रिपोर्ट पर भी धूल की परत जम गयी है।
कांग्रेस नेता शैलेन्द्र जायसवाल ने बताया कि जिला प्रशासन से आरटीआई के जरिए सिम्स में 2013 भर्ती के दौरान लापरवाही को लेकर लोक आयोग जांच रिपोर्ट की मांग की। महीनों बीत जाने के बाद भी आरटीआई का जवाब नहीं मिला। लोक आयोग की कापी किसी अन्य माध्यम से मिली है। लोक आयोग के सात पेज के रिपोर्ट में बताया गया है कि 2013 में लिपिक और अलिपिक भर्ती परीक्षा में सिम्स के जिम्मेदार लोगों ने भारी भ्रष्टाचार की है।
लोक आयोग रिपोर्ट के अनुसार चयन प्रक्रिया के दौरान शासन के सेटअप से छेड़छाड़ किया गया है। शासकीय सेवा में नियुक्ति के लिए भर्ती नियमों के बारे में शासन से अनुमति या दिशा निर्देश लिया जाना जरूरी है। लेकिन सिम्स में लिपिक, अलिपिक कर्मचारियों की भर्ती में सारा काम स्वशासी समिति ने किया। यह जानते हुए भी कि शासकीय सेवा में नियुक्ति करने अथवा बनाने का अधिकार केवल शासन को है।? लोक आयोग रिपोर्ट में बताया गया है कि जांच पड़ताल के दौरान भर्ती को लेकर तात्कालीन प्रभारी के कुछ नोटशीट मिले है। इसमें विभिन्न प्रकार की समितियों का जिक्र तो है। लेकिन वह अस्तित्व में नहीं पाया गया है। दरअसल भर्ती और नियुक्तियों करने वाली समिति बनी ही नहीं। तात्कालीन डीन ने नियमानुसार चयन समिति का गठन ना करते हुए भर्ती का अधिकार महाविद्यालय प्रशासन को दिया था। भर्ती करने वाले प्रशासनिक समिति में मुख्य रूप से सह प्रभारी डीन और प्रशासनिक अधिकारी सुन्दरेशन शामिल थे। जबकि सुन्दरेशन की पत्नी खुद परीक्षा दे रही थीं। ऐसी सूरत में उन्हें समिति में नहीं होना चाहिए था। क्योंकि सुन्दरेशन इस दौरान भर्ती प्रक्रिया के कर्ताधर्ता थे। रिपोर्ट में बताया गया है कि गठन की गई फर्जी समिति में चार सदस्यों की बात कही गयी है। लेकिन दो अन्य कर्मचारियों का कहीं जिक्र नहीं है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि तात्कालीन डीन ने स्वैच्छाचारिता की हद को पार किया। भर्ती घोटाले को छिपाने के लिए डीन के अनुमोदन से आदेश निकाला गया कि मूल्यांकन के बाद समिति अंकों की सूची बनाएगी। सूची में दर्ज अंको को कम्प्यूटर में फीड करने के बाद सूची को नष्ट कर दिया जाएगा। लोक आयोग ने बताया है कि अंकों की सूची को अनुमोदन के लिए शासन के पास भेजा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। सूची को कालेज के कौंसिल में रखा गया। जो पूरी तरह से नियम विरूद्ध है।
लोक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2012 में जारी विज्ञापन के अनुसार नियमित, संविदा अथवा दैनिक वेतन भोगियों को प्रतिवर्ष एक अंक और अधिकतम पांच अंक अनुभव के लिए दिया जाएगा। डीन के अनुमोदन के बाद इसे कालेज कौंसिल में रखा गया। जबकि इसकी जरूरत नहीं थी। क्योंकि कालेज कौंसिल को भर्ती प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं होता है। उसे केवल चिकित्सा शिक्षा और छात्रों के संबंध में निर्णय का अधिकार है। बावजूद इसके कौंसिल के सामने 28 मई 2012 के डीन के अनुमोदन को रखा गया। बल्कि अंको की छूट में भी संशोधन किया गया। कालेज कौंसिल ने निर्णय लिया कि अतिरिक्त अंक का लाभ केवल सिम्स में काम करने वाले संविदा कर्मचारियों को ही दिया जाएगा। लिपिक और अलिपिक सेवा भर्ती नियम 2011 के अनुसार सीधी भर्ती मेरिट के आधार पर होनी थी। तात्कालीन प्रभारी अधिष्ठाता ने शासन को बिना सूचना दिए भर्ती नियम में बदलाव किया। चयन समिति से रायशुमारी किए बिना सूची को खुद ही अनुमोदित कर दिया। दिखावे के लिए कालेज कौंसिल और स्वशासी समिति से अनुमोदन करवाया गया। जबकि दोनों समितिओं को भर्ती प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भर्ती के बाद मामले में शासन को अवगत कराया जाता है। कितने लोगों की भर्ती हुई,भर्ती के तौर तरीकों और प्रक्रिया की जानकारी दी जाती है। शासन के सामने अनुमति के लिए रखा जाता है। बावजूद इसके ऐसा कुछ नहीं किया गया। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि प्रभारी अधिष्ठाता और डीएमई ने विज्ञापन के बाद पदों की संख्या बढ़ाने के लिए शासन से अनुमति लेना मुनासिब नहीं समझा। भर्ती नियमों में  बदलाव से पहले शासन से अनुमति लेना जरूरी होता है। लेकिन यहां भी तात्कालीन सिम्स प्रबंधन ने ऐसा कुछ नहीं किया। शासन से निर्धारित भर्ती मापदण्डों में ना केवल छेड़छाड़ किया बल्कि अनुमति भी लेना उचित नहीं समझा।
मालूम हो कि सिम्स में भर्ती के दौरान धांधली की शिकायत को लेकर कर्मचारियों ने तात्कालीन समय कई बार हड़ताल और जांच की मांग की। बावजूद इसके उनकी आवाज को साम दाम दण्ड नीति नीति से दबा दिया। लगातार आंदोलन के बाद शासन ने मामले को लोक आयोग के हवाले कर दिया। लोक आयोग ने जांच रिपोर्ट भी सौंप दी। लेकिन आज तक रिपोर्ट पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई। रिपोर्ट में स्पष्ट है कि भर्ती के दौरान एक एक बिन्दु पर भ्रष्टाचार हुआ है। सिम्स प्रबंधन ने शासन के निर्देशों की जमकर धज्जियां उड़ाई है। बावजूद इसके अब किसी पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई।