छत्तीसगढ़ के धमतरी के सेमरा गांव में हर पर्व 7 दिन पहले ही मना लिया जाता है. दिवाली भी यहां 7 दिन पहले गुरुवार 12 अक्टूबर को मना ली गई. इसके पीछे ग्राम देवता के नाराजगी का भय होना कारण बताया जा रहा है. ग्राम देवता के नाराजगी का भाय, अनिष्ट की आशंका ही समेरा गांव की परंपराओं को अनोखी बना देती है.
 

समेरा गांव की एकता त्योहारों में नजर आती है. यहां की दिवाली देखने दूसरे गांवो के लोग भी हर साल आते हैं.

जहां दिवाली के सात दिन पहले लोग खरीदारी, साफ सफाई में लगे होते हैं. वहीं सेमरा में सात दिन पहले ही लक्षमी पूजा और आतीशबाजी खत्म हो जाती है.

वर्तमान दौर में इसे भले ही अंधविश्वास कहा जाएगा, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि आस्था ने पीढ़ीयों से गांव को एक परिवार की तरह बांध कर रखा है. यहां की दिवाली सारा गांव एक परिवार की तरह मिल कर मनाता है. धनतेरस से लेकर गोवर्धनम पूजा तक. सब कुछ सात दिन पहले मनाया जाता है.
 

सारी दुनिया से सात दिन पहले चलने की इस प्रथा के पीछे पीढ़ीयों पुरानी आस्था है.

गांव के बड़े बुजुर्ग इसके पीछे एक किंवदंती सुनाते हैं, जो उन्होंने भी अपने बुजुर्गों से सुनी थी. ग्रामीण गजेंद्र सिन्हा व सुखाराम बताते हैं कि काफी पहले गांव में अलग—अलग जाति के दो दोस्त रहते थे. एक बार दोनों जंगल गए, लेकिन जंगली जानवर का शिकार हो गए. दोनों के शव गांव के अलग—अलग सरहद पर दफनाए गए.

मौत के कुछ दिन बाद गांव के मालगुजार को वही दोस्त सपने में आए और कहा कि गांव में हमें देवता के रूप में मानो. दीपावली. अष्टमी या नवमीं को मनाओ. यदि कोई इससे अलग मनाएगा तो उसे अनिष्ट का सामना करना पड़ेगा. बस तब से ही यहां दीवाली अमावस्या की जगह अष्टमी को मनाई जाती है. गांव उन दोस्तों की पूजा सिरदार देवता के रूप में करता है.

समेरा के ग्रामीण राम साहू बताते हैं कि नई पीढ़ी आज भले ही इंटरनेट के जरिये पूरी दुनिया से जुड़ी है, आधुनिक संसाधनो का उपयोग करती है, लेकिन गांव की इस प्रथा को वो भी स्वीकारती है. इसे युवा पुरखों की धरोहर मानते है और आगे भी बढ़ाना चाहते हैं.