पूर्व वैदिक, वैदिक और वेदोत्तर काल में प्रत्यक्ष देव महारुद्र सूर्य की स्तुति से असाध्य भयावह रोगों से मुक्ति एवं कायाकल्प का विवरण मिलता है। प्राचीन मिस्र एवं यूनानी संस्कृति में सूर्य को मृत संजीवनी माना गया है। प्राचीन मिस्र के ‘रॉ’ अर्थात ‘सूर्य’ प्रमुख देवता रहे हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50वें सूक्त, मंत्र 11-13 में प्रार्थना की गई है। सूर्य उदित होकर और उन्नत आकाश में चढ़कर हमारे मानस रोग (हृदयस्थ), पीत वर्ण रोग और शरीर रोग को नष्ट करो। आदित्य मेरे अनिष्टकारी रोग विनाश के लिए समस्त तेज के साथ उदित हुए हैं। मैं अपने हरिमाण तथा शरीर रोग को शुक एवं सारिका पक्षियों पर न्यस्त करता हूं।

अथर्ववेद में आदित्य को रुद्र रूप से लिखा है : प्राची दिगग्रिरधिपतिसितो रक्षितादिव्या इषव:। वही अथर्ववेद में आदित्य यानी रुद्र का उल्लेख मिलता है। ये सपत्ना अप ले भवन्तिन्द्रग्रिभ्यामव बाधामह एनान। आदित्य रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमऋत।।ऋग्वेद में भुनस्य पिता रुद्र: आदि लिखा है। महारुद्र के तीन नेत्रों में सूर्य, चंद्र और अग्रि बताए गए हैं। रुद्र को अनंत ब्रह्मांड स्वामी (जगतांपति) माना गया है। रुद्र की उपमा सूर्य से दी गई है। वैदिक रुद्र भव (सबका उत्पादक), शर्व (सबका संहारक), मयस्कर (सुख प्रदायक) है। भुवनस्य पितरं रुद्रं सभी सूर्यों के प्रसवकर्ता सविता की ओर संकेत किया है।

 

अथर्ववेद की संहिता में रोग निवारण के अनेक मंत्र हैं। अथर्ववेद का मंत्र है : अनु सूयमुदयतां हृदद्योतोहरिमा च ते। गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परिध्मसि।