बाराबंकी में इन दिनों एक मिशनरी स्कूल की प्रिंसिपल अर्चना थॉमस का फरमान चर्चा में है. यहां स्कूल में कक्षा 7 में पढ़ने वाली एक लड़की सिर पर स्कार्फ बांधकर पहुंची तो स्कूल प्रबंधन ने उसके अभिभावक को लिखित फरमान सुना दिया कि बच्चे को किसी इस्लामिक स्कूल में दाखिल करा दें.

 

मामला बाराबंकी की नगर कोतवाली इलाके के ईसाई मिशनरी स्कूल आनन्द भवन का है. इस स्कूल में अपनी लड़की को पढ़ाने वाले मौलाना मोहम्मद रज़ा रिजवी ने एक दिन बेटी को सिर पर स्कार्फ बांध कर भेज दिया था. इस पर विद्यालय प्रबन्धन ने एतराज किया.

 

छात्रा को दोबारा स्कार्फ न बांधकर आने के लिए कहा गया. इसके बाद जब अभिभावक ने मामले में स्कूल से सवाल पूछे तो स्कूल प्रबंधन ने पत्र भेजकर अभिभावक को हिदायत दी कि भविष्य में इस मुद्दे पर पत्राचार न करें और अगर कोई समस्या है तो अपनी लड़की का दाखिला किसी इस्लामिक स्कूल में करवा दें.

 

स्कूल के इस फरमान पर पिता मौलाना मोहम्मद रज़ा रिज़वी कहते हैं कि हमारे धर्म में एक निश्चित आयु तक लड़कियों को सिर ढकने के लिए सिर पर स्कार्फ बांधने की बाध्यता है और इसीलिए मेरी लड़की स्कूल में सिर पर स्कार्फ बांध कर गई थी. इस पर स्कूल प्रबंधन ने एतराज़ जताया.

 

 

जब स्कूल से हमने अपनी मजबूरी बताकर पत्राचार किया तो स्कूल को ओर से फरमान सुनाते हुए लिखित रूप से दे दिया गया कि मैं अपनी लड़की का दाखिला किसी इस्लामिक स्कूल में करवा लूं.

 

इस मुद्दे पर जब हमने स्कूल की प्रधानाचार्या अर्चना थॉमस से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मेरा इरादा किसी धर्म को ठेस पहुंचाना नहीं था. न ही उनको किसी इस्लामिक स्कूल में दाखिले के लिए मजबूर किया गया है. मगर, हां उनसे यह जरूर कहा गया है कि अगर उन्हें स्कूल के नियमों में कोई असुविधा है तो वह अपने बच्चे को यहां से निकाल कर कहीं और भेज सकते हैं.

 

इस प्रकार का मामला पहली बार उनके सामने आया है. मगर जब भी कोई अभिभावक अपने बच्चे का दाखिला यहां करवाता है तो एडमिशन फॉर्म पर स्कूल के सभी नियम लिखे होते हैं. अभिभावक उन लिखे हुए नियमों पर हस्ताक्षर करके अपनी सहमति देता है.

 

स्कूल का अपना एक ड्रेस कोड है. अपने नियम हैं. जिसका पालन सभी छात्रों और अभिभावकों को करना पड़ता है. अगर इन नियमों को पालन करने पर में किसी को परेशानी है तो वह अपने बच्चे को यहां से निकाल सकता है और यही बात मेरे द्वारा कही गयी है.