जंगलों में पैदा होने वाली वन उपज अब आदिवासियों की तकदीर बदलेगी. आदिवासियों और जंगल की बहुलता वाले क्षेत्र उदयपुर में लघु वन उपज का बड़ा मार्केट तैयार करने की राज्य सरकार की योजना है. देश की पहली वन उपज मंडी उदयपुर में स्थापित की गई है और वन उपज को मार्केट उपलब्ध करवाने के लिहाज से वन अधिनियम में भी जरूरी बदलाव किए गए हैं.

 

प्रदेश के उदयपुर संभाग में बड़े पैमाने पर अरावली पर्वतमाला मौजूद है. अरावली पर्वतों की इस श्रृंखला पर मौजूद जंगलों में प्रकृति ने बड़ी मात्रा में वन उपज खुले रूप से उपलब्ध करवाई है.

 

एक मोटे अनुमान के मुताबिक एक हजार करोड़ की वन सम्पदा उदयपुर संभाग के जंगलों में बिखरी पड़ी है, लेकिन जानकारी के अभाव और विपणन व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने के चलते ये वन उपज जंगलों में ही खराब हो जाती है. इतना ही नहीं जटिल वन कानून भी इस मामले में कोढ़ में खाज का काम कर रहे थे, लेकिन अब यही वन उपज आदिवासियों की तकदीर बदलेगी.

 

जंगलों में खराब होने वाली वन उपज के सदुपयोग और उदयपुर संभाग के आदिवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए राज्य सरकार लघु वन उपज का बड़ा मार्केट तैयार करने जा रही है.

इस दिशा में काम करते हुए देश की पहली लघु वन उपज मंडी 440 लाख रुपए की लागत से उदयपुर संभाग में स्थापित की गई है. जहां उत्पादन वहीं विपणन की योजना के तहत उदयपुर के आस-पास के इलाकों में भी वन उपज मंडियां बनाने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया गया है और इसके लिए 121 करोड़ की राशि की घोषणा भी की गई है.

 

राजस्थान के कृषि मंत्री डॉ. प्रभुलाल सैनी का कहना है कि वन अधिनियम के तहत वन उत्पाद बेचने के लिए ट्रांजिट परमिट की जो आवश्यकता होती थी उसे राज्य सरकार द्वारा खत्म कर दिया गया है, जिसका सीधा लाभ आदिवासियों को मिलेगा. आयुष और मेडिकल कम्पनियों के माध्यम से वन औषधियों की बिक्री की राज सरकार की योजना है.

 

एक अनुमान के मुताबिक, जंगलों में पैदा होने वाली बहुमूल्य वन उपज 99 फीसदी जंगलों में ही नष्ट होती रही है. वन अधिनियम के तहत वन उपज को बेचने के लिए ट्रांजिट परमिट की आवश्यकता थी और इसके अभाव में दोषी व्यक्ति को सजा का भी प्रावधान था, लेकिन अब ट्रांजिट परमिट की जरुरत खत्म करने और लघु वन उपज के लिए विशेष मंडी बनाए जाने से जंगलों में खराब होने वाली वन उपज आसानी से बाजार तक आ सकेगी.

 

विशिष्ट मंडी बनाए जाने से औने-पौने दामों में बिकने वाली वन उपज के अब आदिवासियों को अच्छे दाम मिलने लगे हैं और उनके लिए यह रोजगार का बेहतर विकल्प साबित हो रहा है.

 

वन उपज के लिए विशिष्ठ मंडी बनाए जाने और इसे जटिल कानूनों से मुक्त किए जाने का ही परिणाम है कि पिछले दो साल में 179 करोड़ की वन उपज मंडी में बिकने के लिए आई है. पहले कौढ़ियों के दाम बिकने वाली उपज के अब कई गुणा दाम मिल रहे हैं, जिससे जंगलों में बसने वाले आदिवासियों के लिए घर बैठे रोजगार की व्यवस्था हो रही है. अलग से मंडी बनाए जाने से वन उपज बेचने वाले और खरीदने वाले दोनों को एक उचित प्लेटफॉर्म मिल रहा है, जिससे इसका बेहतर मार्केट तैयार हो रहा है.