मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को, शायद हर समय इतिहास से सबक लेने की जरूरत होती है. और अब उन्‍हें सबसे सही सबक के लिए एक इतिहासकार मिल गया है. ये है फिल्‍मकार संजय लीला भंसाली. इनकी आने वाली फिल्‍म ‘पद्मावती’ ने चौहान को प्रेरित किया है कि वह राजस्‍थान के मेवाड़ इलाके की मध्‍ययुगीन रानी पद्मिनी या पद्मावती को राष्‍ट्रीय प्रतीक घोषित कर दें. चौहान ने हाल ही में कुछ लापरवाही भरे बयान दिए हैं.

 

मिसाल के तौर पर यह ऐलान किया गया कि आर्थिक रूप से पिछड़े राज्‍य मध्‍य प्रदेश की सड़कें अमेरिकी सड़कों से कहीं अधिक दुरूस्‍त हैं. अब वो भंसाली की विवादों से घिरी फिल्‍म पद्मावती पर अपनी साहसी प्रतिक्रिया देते हुए कुछ नायाब तोहफों के साथ सामने आए हैं.

 

इस बात पर बहस मुसाहिबा बना हुआ है कि ऐतिहासिक तथ्‍यों की रोशनी में इस फिल्‍म की कहानी में सच्‍चाई कितनी है. इस कहानी को 16 वीं सदी के सूफी संत मलिक मोहम्‍मद जायसी ने अपने काव्‍य ग्रंथ ‘पद्मावत’ में अपने ही अंदाज में बयां किया है. उन्‍होंने रानी पद्मावती का जिक्र करते हुए कहा है कि जब उनके शौहर और चित्‍तौड़गढ़ के राजा रतन सिंह के इस सूबे पर उस वक्‍त दिल्‍ली के मुसलमान सुल्‍तान अलाउद्दीन खिलजी ने हमला किया तो उसकी नजर इस बेहद खूबसूरत रानी पर भी थी.

इसके बाद रानी ने जौहर करते हुए खुद को आग की लपटों को हवाले कर दिया. कहानी के मुताबिक पद्मावती ने दुश्‍मन राजा के हाथों में पड़ने से मौत को गले लगाना बेहतर समझा.

 

कई इतिहासकारों ने इस घटना को सिरे से खारिज करते हुए इसे जायसी की खामख्‍याली करार दिया है.

 

भारत के प्राचीन और मध्‍य युग के चर्चित इतिहासकार इरफान हबीब ने फ़र्स्‍टपोस्‍ट को बताया, ‘कई इतिहासकारों ने पाया है कि ये कल्‍पना भर है. उस समय के इतिहास में इस वाकये का कोई जिक्र नहीं मिलता.’

गैंगरेप पीड़िता को अवॉर्ड देना कितना संवेदनशील?

चौहान ने एक हास्‍यापद कोशिश करते हुए रानी पद्मावती को बतौर ‘राष्‍ट्रमाता पद्मावती’ का दर्जा देते हुए उनकी एक प्रतिमा लगाने और उनके नाम पर एक अवार्ड देने का भी हुक्‍मनामा जारी दिया है. इस तरह का पहला अवार्ड हाल ही में भोपाल में गैंगरेप की शिकार बनी एक लड़की को दिया जाएगा.

 

बलात्‍कार की शिकार को अवार्ड? अवार्ड कुछ हासिल करने पर दिया जाता है. उस बेचारी लड़की को अवार्ड, जो पहले से ही बलात्‍कार के दंश से गुजर रही है? चौहान दुनिया को ये भरोसा देना चाहते हैं कि उस लड़की ने डर का सामना करके महान साहस का परिचय दिया है. सच? यह साहस की मिसाल है या फिर खुद का बचाव करने में पूरी तरह से बेसहारा होने की.

 

गल्‍प इतिहास - रानी पद्मावती – जौहर - मध्‍य प्रदेश में गैंगरेप और ये अवार्ड - चौहान का यह खूब चालाकी भरा तरीका है जिसके जरिए वे इस सारे गड़बड़झाले को साथ रखकर खुद के लिए भसड़ ही बना रहे हैं.

 

बहुत अचरच की बात है मुख्‍यमंत्री के पद पर आसीन एक आदमी- एक ऐसा पद जो मुल्‍क में सबसे बड़े पदों में शुमार किया जाता है- इस प्रकरण में शामिल हो गया है. अगर उन्‍हें इस फिल्‍म से कोई खास दिक्‍कत है, जैसी राजस्थान की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को है, तो वे सही तथ्‍यों का चयन कर सकते थे और अपने विचारों को ठीक-ठाक ढंग से लोगों के सामने पेश कर सकते थे.

 

पर इसके बजाए उन्‍होंने तरफदारी करते हुए सामूहिक दुष्‍कर्म की शिकार लड़की को इस अवार्ड को देने की बात कही. उस लड़की को शायद एक सार्वजनिक अवार्ड से कहीं अधिक जरूरत इस बात है कि वो अपने तकलीफों से निजात पर सके.

 

यहां ये बताना गैरजरूरी नहीं होगा कि वो पीड़िता, एक 19 साल की कॉलेज में पढ़ने वाली छात्रा है और भोपाल शहर में 31 अक्‍टूबर की शाम जब वह प्रशासनिक सेवा परीक्षा की कोचिंग कक्षा को पूरा करके घर वापस आ रही थी तो उसके साथ सामूहिक दुष्‍कर्म को अंजाम दिया गया. उसे और उसके माता-पिता को इस मामले की प्राथमिकी दर्ज कराने में खासी तकलीफों से गुजरना पड़ा. जब ये वाकया मीडिया में आया तो कुछ पुलिस अफसरों को मुअत्‍तल कर दिया गया. लेकिन परेशानियों का सिलसिला थमा नहीं.

 

सरकारी डाक्‍टर ने उसकी मेडिकल रिपोर्ट में यह बता कर झमेला कर दिया कि यह ‘सामूहिक बलात्‍कार, सहमति से किया गया सेक्‍स था.’ इसमें बाद में सुधार किया गया.

अवॉर्ड की जगह सुरक्षा की जरूरत

मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यतंत्री के ऐलान के तुरंत बाद, सूबे के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने कथित तौर पर एएनआई को बताया कि राज्‍य सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि इस अवार्ड को हाल में हुए भोपाल गैंगरेप की पीड़िता को दे दिया जाए.

 

उन्‍होंने कहा, ‘सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि ये अवार्ड गैंगरेप पीड़िता को दिया जाए, उस लड़की ने हालात का सामना करने में अनुकरणीय साहस का परिचय दिया और वह लोगों के सामने इस मामले को लेकर आई (प्राथमिकी दर्ज करा करके). वो बहुत बहादुर है और इस अवार्ड की हकदार है. मुख्‍यमंत्री इस पर आखिरी फैसला करेंगे.’

 

पर पद्मिनी की कहानी महज यहीं खत्‍म नहीं होती. मामले में ताजा मोड़ यह आया है कि 22 नवंबर को चौहान ने उज्‍जैन में कहा, ‘राजपूत रानी पद्मिनी की कहानी अगले साल से मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में पढ़ाई जाएगी.’

 

राज्‍य की पूर्व मुख्‍य सचिव और गैर सरकारी संगठन- महिला चेतना मंच, की मुखिया निर्मला बुच ने फ़र्स्‍टपोस्‍ट से कहा, ‘मुख्‍यमंत्री का प्रयास राजनीति का एक हिस्‍सा है और इसका इतिहास से कुछ लेन- देना नहीं है. आदर्श और अनुकरणीय लोगों की प्रशंसा के बजाए सरकार का ध्‍यान किसानों की परेशानियों, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और महिलाओं की सुरक्षा पर होना चाहिए. एक बलात्‍कार पीड़िता को अवार्ड देने का ऐलान करना, दुष्‍कर्म जैसे गंभीर मामलों की अनदेखी करना है.’

 

सिर्फ तुष्टीकरण कर रहे हैं शिवराज

मुख्‍यमंत्री और उनके गृहमंत्री के इन ऐलानों को उनके राजनीतिक प्रतिद्ंवद्ंवी साल 2018 में मध्‍य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उनकी ‘राजनीतिक कलाबाजी’, अवसरवाद और तुष्टिकरण की कोशिश करार देते हैं.

 

सीपीएम की केंद्रीय समिति के सदस्‍य और राज्‍य महासचिव बादल सरोज कहते हैं, ‘चौहान की कई मोर्चों पर फजीहत हुई है- भ्रष्‍टाचार से लेकर किसानों की समस्‍याओं को सुलझाने तक. ये एक तरीका है ताकि बेपटरी हो चुके उनके शासन पर से लोगों का ध्‍यान हटा दिया जाए. अवार्ड की घोषणा और पाठ्य पुस्‍तकों में शामिल करने की बात कहकर चौहान 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एक राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं क्‍योंकि वे मध्‍य प्रदेश की जमीनी हकीकत को जान कर हताश हो चुके हैं.

 

विपक्षी कांग्रेस ने चौहान की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ये ऐलान मध्‍य प्रदेश में राजपूत समुदाय को बहलाने के लिए हैं.

 

कांग्रेस सूत्रों ने कहा, ‘राजपूतों के तुष्टिकरण से चौहान ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के वोटबैंक को नुकसान पहुंचाना चाह रहे हैं.’

 

यहां ये बताना मुनासिब होगा कि मध्‍य प्रदेश के गुना से सांसद सिंधिया का धड़ा, उन्‍हें आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की तरफ से मुख्‍यमंत्री प्रत्‍याशी के तौर पर देख रहा है. अगर ये शिवराज सिंह चौहान की तुष्टिकरण पहल है तो बहुत बुरी कोशिश है.