मुझे आज भी याद है कि मुझे अपने प्यार यानी ज्योति से एक बार मिलने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। पहली बार हमारी मुलाकात कोचिंग में हुई थी। मैं उसकी बराबर वाली सीट से एक सीट पीछे बैठता था ताकि उसे बिना पता चले उसे देख सकूं। सबकी नजर बचाकर साइकल से उसके पीछे-पीछे घर तक जाना, उसकी छोटी से छोटी आदतों और बातों को याद रखना, उसे तकलीफ में देखकर दर्द महसूस करना और भी न जाने क्या-क्या कोशिशें करता रहता था। 

 

आखिरकार मेरी कोशिशों का पता एक दिन उसे चल ही गया। कोचिंग से छूटकर साइकल से उसके पीछे-पीछे आते हुए उसने मुझे देख लिया और पलटकर मुझसे पूछ लिया कि मैं रोज उसके पीछे-पीछे क्यों आता हूं। मैंने बहाना बनाया कि मेरी दूसरी कोचिंग का रास्ता उसके घर से होकर जाता है। इस पर उसने कहा कि मेरी बर्थडे वाले दिन मेरी सीट पर फूल क्यों रखा था, कोचिंग में हमेशा मेरी सीट के पीछे क्यों बैठते हो, हर वक्त मुझे क्यों देखते रहते हो, मेरे न आने पर मेरी फ्रेंड्स से मेरे बारे में क्यों पूछते हो? 

एक के बाद एक उसके सवालों की बौछारों के सामने मैं नजरें झुकाए खड़ा रहा। उसके बाद उसने आखिरी सवाल किया कि इतना सब कुछ करने की बजाय कभी मुझसे कुछ क्यों नहीं कहा। उसके आखिरी सवाल ने अचानक से मेरी नजरों पर पड़े बोझ को हल्का कर दिया। मैंने नजरें उठाकर देखा तो एक हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर खिल रही थी। उसकी मुस्कान का मतलब समझते मुझे देर नहीं लगी। बिना कुछ कहे बस मुस्कुराते हुए वो घर चली गई। अगले दिन से मैं उसकी सीट के बगल में बैठने लगा, कोचिंग के बाद उसके साथ में घर जाने लगा। उसकी इतनी आदत हो गई थी कि छुट्टी वाला दिन मुश्किल से कटता था। उसका साथ मेरे लिए किसी भी तोहफे से बढ़कर था। 

 

हालांकि हम दोनों ने नजरों से एक दूसरे से काफी कुछ कह दिया था लेकिन जुबान पर कभी दिल की बात लाने की हिम्मत न हुई। आखिरकार मैंने ही पहल की और एक दिन कोचिंग की जल्दी छुट्टी होने पर हम पास के एक पार्क में सैर के लिए गए। उस दिन वहां कम ही लोग थे। हम एक बेंच पर बैठे। दो-चार बातों के बाद वहां एकदम शांति छा गई। मैंने उस दिन मन ही मन अपने दिल की बात जुबान पर लाने का फैसला कर लिया था। इसी बीच उसने मुझसे कहा कि पढ़ाई के बाद मेरा क्या प्लान है। मैंने कहा कि पढ़ाई के बाद मुझे डिफेंस जॉब की तैयारी करनी है। जॉब लगने के बाद बस दो सहारों के साथ जिंदगी बितानी है। एक तो सर पर मां के आशीर्वाद का सहारा। दूसरा मेरे साथ पढ़ने वाली ज्योति नाम की लड़की का जिंदगी भर का सहारा। इतना सुनते ही उसकी आंखों में एक चमक आ गई और कुछ देर बाद वो शरमाकर वहां से जाने लगी। 

 

मैंने उसका हाथ पकड़ा और पूछा कि क्या मुझे दूसरा सहारा मिलेगा। उसने कहा कि तुम्हें मेरे घरवालों से पूछना पड़ेगा। मैं उसका इशारा समझ गया था। मैंने जॉब के लिए अप्लाई किया और जॉब में सेटल होने पर उसके घरवालों से उसका हाथ मांग लिया। हम लोगों के प्यार को आखिर मंजिल मिल ही गई। आज हमें साथ में रहते हुए 10 साल हो गए हैं। भगवान का शुक्र है कि आज मेरी जिंदगी दोनों सहारों के सहारे खुशी से बीत रही है और उम्मीद है कि हमारी जिंदगी में जल्द ही नन्हे सहारे भी एंट्री लेंगे।