गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 की 189 सीटों के लिए पहले चरण की 89 सीटों पर वोटिंग हो चुकी है. मौजूदा विधानसभा में इन 89 सीटों में 67 सीट बीजेपी के पास है और महज 16 सीटें कांग्रेस के पास हैं. अगले चरण में बची हुई 93 सीटों के लिए पोलिंग गुरुवार 14 दिसंबर को होगी जिसके बाद सोमवार 18 दिसंबर को वोटों की गिनती की जाएगी.

 

पिछले चुनावों में इन सीटों पर लगभग 72 फीसदी वोटिंग के जवाब में इस बार प्रेस ब्रीफिंग में 68 फीसदी वोटिंग की घोषणा की गई है. आयोग को उम्मीद है कि अंतिम आंकड़े 2012 विधानसभा चुनावों के रिकॉर्ड को तोड़ने भी सकते हैं. 2012 चुनावों में नरेन्द्र मोदी को कुल 116 सीटों पर जीत के साथ तीसरी बार राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला था. गुजरात में बीते 22 साल से बीजेपी सत्ता में है.

 

हालांकि गुजरात में चुनाव दर चुनाव कई सीटों पर बीजेपी को विपक्ष से एक तरह का वॉकओवर मिलता रहा है लेकिन इस बार कुछ राजनीतिक पंडित दावा कर रहे हैं बीजेपी के लिए स्थिति कुछ बदल चुकी है. राज्य में कांग्रेस से बढ़ती उम्मीद, दो दशक की एंटीइनकम्बेंसी, पटेल आरक्षण आंदोलन, अल्पेश ठाकोर का ओबीसी नेतृत्व और जिग्नेश मवाने के नेतृत्व में चल रहा नया दलित आंदोलन मिलकर कांग्रेस के लिए दशकों बाद एक आदर्श स्थिति पैदा कर रहा है. लेकिन क्या महज यह आदर्श स्थिति उलटफेर के लिए पर्याप्त हैं यह 18 दिसंबर को ही पता चलेगा.

 

बीजेपी का दावा है कि उसे 120 सीटों से अधिक पर जीत मिलने जा रही है. वहीं अमित शाह ताल ठोककर 150 सीटों पर जीत की बात कर रहे हैं. कांग्रेस से अहमद पटेल भी 110 सीटों पर जीत देख रहे हैं. ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षणों ने कांटे की टक्कर की बात कहते हुए बीजेपी को मजबूत स्थिति में बताया है. वहीं सर्वोक्षणों के सर्वेक्षण में बीजेपी को मुश्किल से 92 सीटों का आंकड़ा पार करते देखा जा रहा है.

 

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) भी चुनावों के दौरान बदनाम हो रही है और इस बदनामी को रोकने में चुनाव आयोग की सभी कोशिशें भी कारगर साबित होती नहीं दिख रहीं हैं. इस बार ईवीएम में वीवीपैट (वोटर को रसीद देने की सुविधा) लगा हुआ है जिससे वोटर को जानकारी मिल सके कि उसका वोट उसी पार्टी को गया है जिसके लिए उसने बटन दबाया था. इसके बावजूद ईवीएम गड़बड़ी के कई मामले दर्ज होने के साथ चुनाव आयोग कह रहा है कि इस्तेमाल हो रहे 24 हजार ईवीएम में कुछ को गड़बड़ होंगे ही.

 

दक्षिण गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ इलाके में वोटिंग कराई गई है. दक्षिण गुजरात का सूरत इलाका पहले पटेल आरक्षण आंदोलन और फिर नोटबंदी और जीएसटी से परेशान कारोबारियों के विरोध के केन्द्र में रहा है. सूरत राज्य में टेक्सटाइल कारोबार का केन्द्र होने के साथ-साथ देश का डॉयमन्ड पॉलिश का हब है. इस क्षेत्र के कारोबारी लंबे समय से बीजेपी का समर्थन करते रहे हैं लेकिन इस बार इनका विरोध कांग्रेस की किस्मत चमकने का कारण बन सकता है. वहीं पटेल आरक्षण आंदोलन भी नतीजों को पलटने में बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि सूरत पटेलों का मजबूत गढ़ भी है.

 

सूरत के बाद सौराष्ट्र दूसरा अहम क्षेत्र है जहां दोनों पार्टियां बड़ा उलटफेर करने का दावा कर रही हैं. इस क्षेत्र में भी पटेल वोटरों का वर्चस्व है और आंदोलन के दौरान 12 पटेलों की जान भी जा चुकी है. लिहाजा इस क्षेत्र में पटेल आरक्षण आंदोलन बेहद आक्रामक और हिंसा से भरा हुआ रहा है. इस क्षेत्र में पटेलों ने बीजेपी सरकार को आंदोलनकारियों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराता हुए उसे सबक सिखाने का दावा किया है. हालांकि कुछ रिपोर्ट दावा करती हैं कि एक बड़े तबके को बीजेपी मनाने में कामयाब हुई है लिहाजा कांग्रेस के पक्ष में किसी बड़े उलटफेर की संभावना कम है. बहरहाल, कांग्रेस द्वारा इस क्षेत्र में भी कुछ अप्रत्याशित करने की बात को नकारा नहीं जा सकता है.

 

वहीं कच्छ जैसे रेगिस्तानी इलाके में बीजेपी को समर्थन दो अहम कारणों से जारी रहने की उम्मीद है. मौजूदा समय के वोटरों के बीच 2001 में आए भूकंप के बाद पुनरनिर्माण की बीजेपी सरकार की उपलब्धियां बड़ी वजह है. वहीं इस क्षेत्र में नर्मदा का पानी पहुंचने से भी प्रधानमंत्री मोदी से वोटरों की उम्मीद बढ़ी है. वोटरों का मानना है कि आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मोदी की कोशिशों से क्षेत्र में टूरिज्म को बड़ा बढ़ा देखने को मिल सकता है.    

 

जहां गुजरात चुनावों के लिए प्रचार की शुरुआत कांग्रेस के विकास पगला गया और बीजेपी के मैं विकास हूं के नारे से हुई लेकिन इससे दोनों पार्टियों के बीच महज तीखी बहस देखने को मिली और वोटरों पर कोई खास असर नहीं पड़ा. वहीं सांप्रदायिकता का झटका चुनावों में दूसरा मुद्दा है जिसमें दोनों पार्टियां अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं. अयोध्या से लेकर पाकिस्तान का मुद्दा चुनावों में गर्म रहा है. हालांकि चुनावों में 2002 के गोधरा कांड को कांग्रेस समेत किसी ने नहीं उठाया है.

 

जहां कांग्रेस और बीजेपी ईवीएम मशीनों में जंग जीतने की कोशिश में हैं वहीं एक गांव ऐसा भी है जिसने पूरी चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार किया है. बहिष्कार के बाद किसी प्रमुख पार्टी ने इस गांव में वोट मांगने की कोशिश भी नहीं की है. इस गांव में बिजली, पानी सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का अभी भी इंतजार है. गांव के सभी 1,065 वोटरों ने इस उम्मीद पर पोलिंग बूथ न जाने की कसम खाई है कि जीतने वाली पार्टी उनके विरोध से उनका संज्ञान लेगी और उन्हें जल्द से जल्द उनके लिए जरूरी कदम उठाएगी. इस गांव को विकास के मुद्दे पर हो रहे चुनाव के वक्त भी विकास का इंतजार है.