भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा गैर-निष्पादित आस्तियों की दूसरी सूची के आने की घड़ी नजदीक आते ही कर्जदाता और कारोबारी संगठनों ने केंद्रीय बैंक से संपर्क कर इसकी 13 दिसंबर की समयसीमा को टालने की मांग की है। अगर 13 दिसंबर, 2017 तक कर्ज निपटान पर निर्णय नहीं हुआ, तो सूची में शामिल 28 कंपनियों के खिलाफ ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता के तहत इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इन कंपनियों पर करीब 1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है।

 

 

सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के प्रमुख ने कहा, '28 खातों से जुड़े कर्ज निपटान को लेकर अब तक उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। यही वजह है कि कुछ बैंकों ने इसकी समयसीमा बढ़ाने की मांग की है।' उन्होंने कहा कि अगर समयसीमा नहीं बढ़ाई जाती है, तो एकाध अपवाद को छोड़कर ज्यादातर कंपनियां राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में जा सकती हैं। ऋण निपटान के लिए बैंकों के समक्ष जिस तरह के प्रस्ताव आए वे बैंकों को स्वीकार्य नहीं थे, इसीलिए इस पर निर्णय लेना काफी कठिन हो रहा है।

 

 

यूको बैंक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी आरके ठक्कर ने कहा कि यूको बैंक ने समयसीमा बढ़ाने के लिए आग्रह नहीं किया है। लेकिन आरबीआई अगर समयसीमा नहीं बढ़ाता है तो कई कंपनियां एनसीएलटी में जा सकती हैं। उन्होंने कहा, 'काफी कम मामलों में ही बैंक निपटान के अंतिम चरण में हैं।' यूको बैंक का इन 28 कंपनियों में से 16 में करीब 4,500 करोड़ रुपये का कर्ज फंसा हुआ है।

 

उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि रेटिंग एजेंसियां, जो निपटान प्रस्तावों की समीक्षा कर रही हैं, उन्होंने कंपनियों को नवंबर के तीसरे हफ्ते का समय दिया है। जेएलएफ रेटिंग के आधार पर एक-एक कर मामले को देख रही है। दूसरी सूची में शामिल कंपनी के एक प्रवर्तक ने कहा कि आरबीआई ने संकेत दिए हैं कि वह 5,000 करोड़ रुपये से कम कर्ज वाली फर्मों के लिए अलग दिशानिर्देश ला सकता है। 

 

 

उन्होंने कहा, 'यह दिशनिर्देश अभी तक नहीं आए हैं और बैंक आगे कोई कदम उठाने से पहले उसका इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में 13 दिसंबर तक कैसे निर्णय किया जा सकता है।' इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स ने आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल को पत्र लिखकर इसकी समय सीमा 31 मार्च, 2018 तक बढ़ाने का आग्रह किया है। ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) नया कानून है और इसमें 300 से अधिक खाते हैं लेकिन अब तक किसी का निपटान नहीं हुआ है। ऐसे में बैंक आईबीसी से बाहर कर्ज निपटान के लिए ज्यादा समय चाहते हैं।

 

 

आंतरिक परामर्श समिति की सिफारिशों के आधार पर आरबीआई ने 12 खातों को तत्काल आईबीसी के तहत निपटान का सुझाव दिया था। वर्तमान में ये कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही हैं। दूसरी सूची में शामिल कंपनियों का कहना है कि फिलहाल कर्जदाताओं के लिए कोई बेंचमार्क नहीं है। उनका कहना है कि अगर 12 बड़े खातों का निपटान होता है तो छोटे खातों को लेकर कुछ दिशा मिल सकती है। बोली लगाने के इच्छुक के लिए समय सीमा बढ़ा दी गई है और यह जनवरी तक हो सकता है, उसके बाद मार्च-अप्रैल तक ही निपटान की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। ऐसे में 5,000 करोड़ रुपये से कम के फंसे कर्ज के मामलों को आगे बढ़ाने की पर्याप्त वजह है।

 

कंपनियों का कहना है कि सरकार हाल ही में दिवालिया कानून पर अध्यादेश भी लेकर आई है, जो मुख्य रूप से प्रवर्तकों को अपनी संपत्तियां दोबारा हासिल करने से अलग रखता है। इसके साथ ही कई अन्य मामले भी हैं, जिसके कारण कर्जदाता बिना स्पष्टïता के इस पर आगे बढऩा नहीं चाहते हैं। इस बीच कर्जदाता कर्ज निपटान के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जैसे कि एकबारगी निपटान या कंपनियों की संपत्तियों की बिक्री आदि।