गुजरात चुनाव के लिए वोटिंग पूरी होने के साथ ही एग्जिट पोल के नतीजे सामने आ गए. ये नतीजे कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बुरी खबर की आहट लेकर आए हैं. महीनों की जी तोड़ मेहनत और सधे जातीय समीकरणों के बावजूद कांग्रेस एक्जिट पोल के मुताबिक हिमाचल में सत्ता गंवा रही है जबकि गुजरात में भी उसकी सीटों में कोई खास इजाफा नहीं दिख रहा.


अध्यक्ष बनने से पहले राहुल जिस तैयारी और तेवर के साथ गुजरात चुनाव में उतरे, वो अभूतपूर्व थी. उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ साफ नज़र आ रहा था. यह नया अवतार कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके नए दायित्व को और मज़बूत भी करता है. लेकिन अध्यक्ष के रूप में उनके नाम की घोषणा के एक सप्ताह बाद ही गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव परिणाम आ रहे हैं और अगर एग्जिट पोल के नतीजे सच साबित हुए तो राहुल को कुछ तीखे सवालों के जवाब देने होंगे.


हार की जिम्मेदारी से कैसे बचेंगे?


राहुल के आलोचक कहते हैं कि उनके पूरे राजनीतिक करियर में केवल और केवल हार ही बसी हुई है. वो जहां भी प्रचार करने गए, पार्टी हारती रही. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का पद उनकी मां सोनिया गांधी के पास होने के कारण राहुल की मौजूदगी में हार कांग्रेस पार्टी की हार भी मानी जाती रही. अब, जबकि वो पार्टी अध्यक्ष बन गए हैं और एक बाहरी चेहरे के बजाय गुजरात में लोगों के बीच रचे-बसे नज़र आ रहे थे, गुजरात और हिमाचल चुनाव में कांग्रेस का हारना सीधे तौर पर उनकी हार मानी जाएगी. आलोचक कहेंगे कि चाहे कमान, पार्टी और सर्वाधिकार राहुल को दे दो, उनकी किस्मत में हार ही है.


छवि में सुधार, फिर क्यों बंटाधार?


राहुल निःसंदेह नए अवतार में नज़र आ रहे हैं. उनके बारे में लोगों के बीच धारणा तेज़ी से बदलती महसूस हो रही है. राहुल का आत्मविश्वास बेहतर नज़र आ रहा है और उनका बोलना, चीज़ों का जवाब देना, हाज़िरजवाबी भी सुधरी नज़र आ रही है. पहली बार राहुल एक परिपक्व नेता की तरह दिखाई दे रहे हैं. उन्हें विपक्ष भी मृगछौना मानने की भूल नहीं कर सकता है. लेकिन गुजरात की हार उनपर हास-परिहास के तीखे हमले फिर से करने का मौका खोल देगी. राहुल की छवि में सुधार को इस वक्त एक प्रत्यक्ष प्रमाण की ज़रूरत है लेकिन एग्जिट पोल के मुताबिक गुजरात चुनावों में उसे ये प्रमाण मिलता नहीं दिखता.

नए सेनापति में कैसे भरोसा करेंगे क्षत्रप?


राहुल के लिए गुजरात जीतना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उनकी अपनी पार्टी में उन्हें गंभीरता से लिया जाए, इसके लिए आवश्यक है कि वो खुद को साबित कर पाएं. राहुल पूरा ज़ोर लगाकर भी गुजरात में कांग्रेस की नैया पार नहीं लगाते दिख रहे. ऐसे में वे किस आधार पर बाकी राज्यों में अपने पार्टी के चेहरों से जीत की गारंटी का वचन लेंगे. आने वाले दिनों में राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव होंगे. वहां भी पार्टी के नए नेता उभर रहे हैं. राहुल उनसे जीत की गारंटी तभी मांग सकते थे जब वो खुद ऐसा करके दिखाएं. लेकिन एग्जिट पोल के मुताबिक उन्हें नाकामी मिल रही है.


पार्टी में कैसे रोकेंगे विरोधी आवाजें?


कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी तादाद ऐसे नेताओं की है जो राहुल स्टाइल राजनीति में धीरे-धीरे हाशिए पर ढकेल दिए जाएंगे और कम प्रासंगिक रह जाएंगे. ऐसे में गुजरात के नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक ही रहे तो यही नेता पार्टी के अंदर असंतोष को हवा देंगे. गुटबाज़ी और सोनिया लाओ, कांग्रेस बचाओ जैसे नारे भी दिए जा सकते हैं. यहां तक कि पार्टी में नीचे के स्तर पर कार्यकर्ता का हतोत्साहित होना संगठन को बचाने और फिर से खड़ा करने की दृष्टि से बहुत भारी पड़ सकता है. राहुल को इस वक्त अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह भी भरना है और राहुल विरोधी तत्वों का मुंह भी बंद कराना है. इसमें गुजरात की जीत सहायक सिद्ध हो सकती थी लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं दिख रहा.


विपक्ष किस आधार पर मानेगा नेता?


गुजरात चुनाव के ठीक बाद का पूरा एक साल यानी 2018 अगले आम चुनाव के लिए देश में राजनीति खड़ी करने का वक्त है. इस समय राहुल की जीत ही उन्हें विपक्ष और मोदी से असंतुष्ट लोगों के लिए एक विकल्प के तौर पर सामने ला सकती थी. लेकिन एग्जिट पोल के नतीजे बताते है कि ऐसा होने नहीं जा रहा. अब विपक्ष राहुल में संभावनाएं देखने से इनकार करेगा और बंटा विपक्ष मोदी के खिलाफ एक व्यापक रणनीति तैयार करने से चूक जाएगा.


अगले आम चुनाव में मोदी और भाजपा की राजनीति का विकल्प बनने के लिए और उसका नेतृत्व कर पाने के लिए ज़रूरी था कि राहुल ये चुनाव जीतें. गुजरात में उनकी जीत एक बड़ा संदेश लेकर जाती जिसका असर आगामी विधानसभा चुनावों में भी दिखता और राष्ट्रीय राजनीति पर भी. राहुल की बढ़ी हुई शक्ति ही उन्हें विपक्ष के किसी बड़े मंच को संचालित कर पाने की क्षमता दे सकती थी. अगर एग्जिट पोल के नतीजे सच साबित हुए तो राहुल ये सुनहरा मौका खो देंगे.