छत्तीसगढ़ का बस्तर जहां आए दिन बारूद के धमाके सुनाई देते थे. लेकिन बदलते बस्तर की तस्वीर अब कुछ और नजर आ रही है. बस्तर के बीहड़ में अब बारूद के धमाके कम बच्चों की किलकारी ज्यादा गूंज रही है. देश के नक्सल प्रभावित स्थानों में बस्तर में पुलिस ने ऐसा प्रयोग किया है, जिससे आत्मसमर्पित माओवादियों का जीवन खुशहाल होता दिख रहा है.


साल 2001 में आत्मसमर्पित माओवादी के लिए रिवर्स वेसक्टॉमी (नसबंदी खुलवाना) प्रयोग किया गया. इस प्रयोग से आज उन घरों में किलकारी गूंज रही है, जो कभी हिसां और दहशत के लिए जानें पहचाने जाते थे. आत्मसमर्पित माओवादी अपनी पारिवारिक जिंदगी जी सकें इसलिए सरकार ने ये प्रयोग किया. बस्तर पुलिस के इस प्रयोग की हर ओर सराहना हो रही है.


बस्तर के बीहड़ में बदूंक और बम से कभी दहशत फैलाने वालो नक्सलियों के भयवाह चेहरे पर अब खुशियां व मुस्कान दिखाई देती है. रिवर्स वेसक्टॉमी के जरिए आज बस्तर के दो दर्जन से भी ज्यादा आत्मसमर्पित नक्सलियों का जीवन डगर आगे बढ़ रहा हैं. हालांकि जो प्रयोग 17 साल पहले पुलिस ने किया था, वो माओवादियों की लिए बनी आत्मसमर्पित पॉलिसी का हिस्सा नहीं था.


मिली जानकारी के मुताबिक दंतेवाड़ा में एक आत्मसमर्पित माओवादी दंपत्ति जो बड़े कैडर में शामिल था, उसने रिवर्स वेसक्टॉमी कराए जानें की इच्छा जताई थी. उस समय पुलिस ने आत्मसमर्पित माओवादी बदरन्ना (बदला हुआ नाम) की इच्छा को देखते हुए रिवर्स वेसक्टॉमी कराने का खर्च वहन किया.


इस सफल प्रयोग की जानकारी कुछ समय पहले बस्तर रेंज के अलग—अलग जिलों में आत्मसमपण करने वाले नक्सल दंपतियों को भी हुई. इस बात की जानकारी बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा को मिली. इस पर आईजी सिन्हा ने साल 2001 में हुए प्रयोग की सफलता को आगे बढ़ाते हुए बस्तर रेंज के करीब दो दर्जन आत्मसमर्पित माओवादियों की रिवर्स वेसक्टॉमी करवाई.


बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा के मुताबिक समय समय पर आत्मसमर्पित माओवादियों के लिए बनने वाली रणनीति में कुछ परिवर्तन भी किए गए. इसमें रिवर्स वेसक्टॉमी के लिए अब सरकार पूरे खर्च का वहन कर रही है. इसके चलते ही दो दर्जन आत्मसमर्पित माओवादियों ने इस सुविधा का लाभ उठाया. आईजी सिन्हा ने बताया कि बस्तर के करीब पांच ऐसे घर हैं, जहां आत्मसमर्पित माओवादियों के घर में किलकारी गूंजी हैं.


कैडर में शामिल होने से पहले करते हैं नसबंदी

बता दें कि नक्सल संगठन व माओवादी संगठन में शामिल होने वाले सीनियर से लेकर जूनियर कैडर तक के लोगों की पहले नसबंदी कराई जाती है. ऐसा इसलिए किया जाता है कि ताकि माओवादी पारिवारिक जीवन न बिता सकें. जानकारों की मानें तो नक्सल संगठन इस नीति को इसलिए अपनाते हैं ताकि नक्सलियों में संवेदना को खत्म किया जा सके.


बस्तर में ये अपने तरह का पहला प्रयोग

आईजी विवेकानंद सिन्हा की मानें तो नक्सल प्रभावित इलाकों में से बस्तर में इस तरह का प्रयोग देश में पहली बार किया गया है. आईजी सिन्हा की मानें तो बस्तर संभाग के अलग-अलग जिलों में करीब बीस ऐसे दंपत्ति हैं, जिनके घर में कुछ समय बाद नन्हे मेहमान आने की तैयारिंया की जा रही हैं.