राजस्थान के वरिष्ठतम् विजेता ने जब सुना कि आप जीत गए तो चेहरे पर आई विजय मुस्कान देखने लायक थी. हम बात कर रहे हैँ 90 साल के एक मुकदमे में मूल पक्षकार 90 वर्षीय बंशीधर की. बंशीधर अपनी सौतेली मां के पौतों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था. राजस्थान उच्च न्यायालय में सम्भवतः प्रदेश के सबसे पूराने पारिवारिक सम्पत्ति विवादों में से एक यह विवाद आखिर खत्म हो गया.सम्पत्ति को लेकर यह लड़ाई एक परिवार में 58 साल पहले शुरू हुई थी जो विभिन्न न्यायालयों में लड़ी जा चुकी थी और अब इस लड़ाई का हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अंत हुआ. इस लड़ाई के दौरान एक पक्ष की तीन पीढ़िया खत्म हो चुकी हैं और अदालत में चौथी पीढ़ी अपने पूर्वजों के अधिकार के लड़ाई लड़ रही थी.


यह मामला साल 1959 में कोर्ट पहुचा था. श्रीगंगानगर के अपर जिला न्यायाधीश संख्या एक के समक्ष यह परिवाद पेश किया था. साल 1977 में हुई थी इस मामले में पहली डिक्री और साल 1987 में अधीनस्थ न्यायालय ने फैसला किया. लेकिन साल 1988 में मामला हाईकोर्ट पहुंच गया. पेशियों के दौरान एक पक्ष की दो पीढ़ियां खत्म हो चुकी हैं लेकिन कानूनी लड़ाई है अब भी जारी थी


दरअसल, यह पूरा मामला है गंगानगर निवासी स्वर्गीय सुरजमल की सम्पत्ति को लेकर है. सुरजमल ने दो विवाह किए थे और अपने सम्पत्ति के बंटवारें में एक पत्नी के बच्चों को कुछ नहीं दिया. जिसके चलते इस विवाद का जन्म हुआ था.


साल 1959 मे गंगानगर अपर जिला न्यायाधीश संख्या एक के समक्ष पहली बार 1959 में मुकदमा नम्बर 32 सुनवाई के लिए आया था. इसके बाद शुरू हुआ पेशियों का सिलसिला. इस मामले में 5 दिसम्बर 1987 को अपर जिला न्यायाधीश संख्या एक ने फैसला सुना दिया. लेकिन इस लड़ाई का अंत इतना आसान नहीं था.



इस फैसले को हरीकृष्ण ने हाईकोर्ट में साल 1988 में चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की. लगभग 19 सालों से हाईकोर्ट में पेशी दर पेशी यह मुकदमा आगे बढ़ता गया और आखिरकार गुरुवार को इस मामले में हाईकोर्ट जस्टिस दिनेश मेहता ने आधे दिन सुनवाई कर इस मामले को अपने अंतिम पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया.


इस अधिकार की लड़ाई को लड़ते हुए एक पक्ष की दो पीढ़िया खत्म हो चुकी है और तीसरीपीढ़ी यानी सूरजमल का पड़पौता विरेन्द्र अप्रार्थी के रूप में कोर्ट में लड़ाई लड़ रहा था.

—  श्याम सुन्दर लदरेचा, अधिवक्ता



वहीं प्रार्थी हरिकिशन की भी मृत्यु हो चुकी है और हरिकिशन 90 वर्षीय भाई बंशीधर इस मामले में प्रार्थी के रूप में मुकदमा लड़ रहा था. हालांकि इस मुकदमे में मूल पक्षकार एक मात्र बंशीधर ही जिंदा है. बंशीधर आज तक अपनी सौतेली मां के पौतों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था