रायपुर। मंडल से चलने वाली 13 ट्रेनों के 94 कोच में 356 बायो टॉयलेट लगाए गए हैं। इसके साथ ही एक-एक कूड़ेदान की भी व्यवस्था की गई है। इसके पीछे रेलवे की मंशा है कि कोच में बदबू और ट्रैकों पर गंदगी न फैले। बायो टॉयलेट में बैक्टीरिया कल्चर जांचने के लिए कर्मचारियों को इंस्ट्रूमेंट भी दिए गए हैं। हर तीन महीने बाद बायो टॉयलेट का निरीक्षण किया जाता है। अभी तक सामान्य व अन्य स्लीपर कोचों में बायो टॉयलेट नहीं होने से बदबू फैलती थी और यात्रियों को परेशानियों को सामना करना पड़ता था।

 

ऐसे काम करता है सिस्टम

 

बायो टॉयलेट टैंक कोच के अंडर फेम में फिट है। इसमें बैक्टीरिया द्वारा मल-मूत्र को नष्ट कर दिया जाता है। इसके बाद हानिरहित पानी बाहर हो जाता है। स्टील टैंक की संरचना कुल 6 भागों में बंटी है। सभी भागों में लेट, बल वाल्व और पी ट्रैप फिट है। टॉयलेट पैन को रबर ट्यूब के साथ जोड़कर लगाया गया है। मल-मूत्र पी ट्रैप पाइप से टैंक में अंदर जाता है। इसमें भरे हुए बैक्टीरिया कल्चर द्वारा मल-मूत्र को बॉयोलाजिकल पद्धति से नष्ट किया जाता है। हानिरहित पानी क्लोरिन चेम्बर से होकर बाहर निकल जाता है।

 

डीआरडीओ ने विकसित की है तकनीक

 

डीआरडीओ ने बायो टॉयलेट की तकनीक विकसित की है। अभी तक मल-मूत्र रेल की पटरियों पर ही गिरता था। इसके आने के बाद जाहिर है अब रेलवे स्टेशनों पर गाड़ी खड़ी होने के बाद गंदगी नहीं फैलेगी।

 

बैक्टीरिया कल्चर जांचने के हैं पैरामीटर्स

 

1- पीएच मानक परीक्षण - टारगेट वैल्यू 6-9 पीएच

 

2- टोटल सॉलिड परीक्षण- टारगेट वैल्यू -675एमजी/100एमएल

 

3-टोटल डिसॉल्वड सॉलिड़ परीक्षण- टारगेट वैल्यू -350एमजी/100एमएल

 

4-टोटल वोलेटाइल सॉलिड परीक्षण - टारगेट वैल्यू -475एमजी/100एमएल

 

5-केमिकल आक्सीजन डिमांड परीक्षण- टारगेट वैल्यू -1800एमजी ओ2/लीटर

 

6-फिकल कौली फर्म्स काउंट- टारगेट वैल्यू 108 सीएफयू/100एमएल