शनिवार दि॰ 13.01.18 को पंजाबी समुदाय का मुख्य पर्व लोहड़ी मनाया जाएगा। लोहड़ी पर्व सौर्य पौष माह के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद तथा माघ संक्रांति की पूर्व रात्रि में मनाया जाता है। शब्द लोहड़ी तीन अक्षरों से मिलकर बना है ल से लकड़ी, ओह से गोहा याने जलते हुए उपले व ड़ी से रेवड़ी। लोहड़ी को लाल लाही, लोहिता व खिचड़वार नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मतानुसार इस दिन कंस ने कृष्ण को मारने हेतु लोहिता राक्षसी को गोकुल में भेजा था, जिसे श्रीकृष्ण ने मार डाला था। इसी कारण लोहिता पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज भी इसे लाल लाही पर्व के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी की लौ अर्थात अग्नि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में जलाई जाती है। यज्ञ पर अपने जामाता महादेव का भाग न निकालने के दक्ष प्रजापति के प्रायश्चित्त के रूप में इस अवसर पर परिजन अपनी विवाहिता पुत्रियों के घर से वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि भेजते हैं। लोहड़ी का पर्व मूलतः आद्यशक्ति, श्रीकृष्ण व अग्निदेव के पूजन का पर्व है। लोहड़ी पर अग्नि व महादेवी के पूजन से दुर्भाग्य दूर होता है, पारिवारिक क्लेश समाप्त होता है तथा सौभाग्य प्राप्त होता है।



विशेष पूजन विधि: घर की पश्चिम दिशा में पश्चिममुखी होकर काले कपड़े पर महादेवी का चित्र स्थापित कर विधिवत पूजन करें। सरसों के तेल का दीप करें, लोहबान से धूप करें, सिंदूर चढ़ाएं, बिल्वपत्र चढ़ाएं रेवड़ियों का भोग लगाएं तथा इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। जाप के बाद सूखे नारियल के गोले में कर्पूर डालकर अग्नि प्रज्वलित कर रेवड़ियां, मूंगफली व मक्की अग्नि में डालकर होम करें तथा 7 बार अग्नि की परिक्रमा करें। पूजन के बाद भोग प्रसाद रूप में वितरित करें। 



पूजन मुहूर्त: रात 20:05 से रात 21:05 तक।

पूजन मंत्र: ॐ सती शाम्भवी शिवप्रिये स्वाहा॥



महागुरु के महा टोटके

दुर्भाग्य दूर करने हेतु महादेवी पर चढ़ी रेवड़ियां गरीब कन्याओं में बाटें। 



पारिवारिक क्लेश से मुक्ति हेतु देवी पर चड़ी उड़द की खिचड़ी काली गाय को खिलाएं।



सौभाग्य की प्राप्ति हेतु त्रिपुरा सुंदरी पर भोग गुड़-तिल के लड्डू काली गाय को खिलाएं।