साहित्यकार महाश्वेता देवी के 92वें जन्मदिन पर गूगल ने उन्हें डूडल के जरिये सम्मान दिया है। महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ था। उनके पिता मनीष घटक बेहद लोकप्रिय कवि और उपन्यासकार थे। मां धरित्री देवी भी समाज सेविका एवं कवियित्री थीं। चाचा ऋतविक घटक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक थे। उनकी शुरुआती शिक्षा ढाका में हुई। देश विभाजन के बाद उनका परिवार पश्चिम बंगाल में आ बसा। महाश्वेता ने अपनी आगे की पढ़ाई शांति निकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय से की।1964 में उन्होंने बिजॉयगढ़ कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। उस वक्त तक उनकी ख्याति बंगाल के आदिवासी समाज और खासकर दलित स्त्रियों के लिए काम करने वाली महिला के तौर पर हो चुकी थी।


उन्होंने झांसी की रानी पर उपन्यास लिखना शुरू किया, जो 1956 में ‘झांसीर रानी’ नाम से छपा। इस किताब ने उन्हें बड़ी ख्याति दिलाई। इसके बाद उनके ‘नटी’ और ‘जली थी अग्निशिखा’ नामक दो उपन्यास छपे। इन किताबों का संबंध 1857 से संग्राम से है। इससे एक तरह से महाश्वेता के लेखन की दिशा का संकेत मिला, जो परवर्ती दौर में आदिवासियों की संघर्षगाथाओं के योग से बिल्कुल स्पष्ट हो गया। 1962 में विजन से रिश्ता टूटने के बाद उन्होंने असीत गुप्त से शादी की, लेकिन यह संबंध भी 1975 में समाप्त हो गया। तब तक वह पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा के आदिवासियों के बीच एक सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में उतर चुकी थीं। महाश्वेता ने करीब ढाई सौ कृतियों की रचना की, जिनका तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।


उनकी चर्चित कृतियों में अरण्य का अधिकार, शालगिरह की पुकार पर, टेरोडेक्टिल, चोट्टिमुंडा और उसका तीर, अग्निगर्भ, हजार चौरासी की मां, मास्टर साब, श्री श्री गणेश महिमा, तारार आंधार, आंधार माणिक, नील छवि आदि उपन्यास शामिल हैं। उन्होंने अनेक कहानियों की रचना भी की है, जिनमें रुदाली, बाढ़, शिकार, बेहुला, द्रौपदी आदि चर्चित रही हैं। उपन्यास और कहानियों के साथ-साथ उन्होंने अन्य विधाओं में भी काफी लिखा। 1980 में उन्होंने ‘वर्तिका’ पत्रिका का संपादन संभालते हुए शोषितों के लिए एक और मंच तैयार किया। उन्होंने हिन्दुस्तान के लिए भी लंबे समय तक नियमित स्तंभ लिखा।


1979 में महाश्वेता को बिरसा मुंडा पर आधारित उनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1986 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1996 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और रमन मैगसेसे पुरस्कार प्रदान किए गए।  2006 में उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया।